रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 326, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३०० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
यक्ष्मारोगपर योगत्रय ।
चन्दनं मधुकं क्षीरं पीतं रुधिरवान्तिजित् ।
भृङ्गराजस्य पत्रन्तु चूर्णितं मधुना सह ॥ ९४ ॥
गोलकं धारयेदास्ये कासारिष्टप्रशान्तये ।
पिबेद्वान्तिप्रशान्त्यर्थं क्षौद्रैश्छिन्नरुहारसम् ॥ ९५ ॥
लाल चन्दन और मुलहठीके चूर्णको दूधके साथ सेवन करनेसे
रुधिरकी वमन दूर होती है । भांगरेके पत्तोंके चूर्णको सहतमें खरल
करके गोलीसी बनाकर मुखमें धारण करनेसे कासजनित अरिष्टके
लक्षण दूर होते हैं । गिलोयके रसको सहतके साथ सेवन करनेसे वमन
शांत होती है ॥ ९४ ॥ ९५ ॥
रजतादि लोह ।
भस्मीभूतं रजतममलं तत्समं व्योमचूर्णं,
सर्वैस्तुल्यं त्रिकटु सवरं लोहमाज्येन युक्तम् ।
लीढं प्रातः क्षपयतितरां यक्ष्मपाण्डूदराशः,
श्वासं कासं नयनजरुजः पित्तरोगानशेषान् ॥९६॥
इति श्रीरसेन्द्रसारसंग्रहे राजयक्ष्माधिकारः ।
स्वच्छ रूपेकी भस्म १ भाग, अभ्रकभस्म १ भाग, त्रिकुटा ३
भाग, त्रिफला ३ भाग और लोहाभस्म ३ भाग इन सब औषधि-
योंको एकत्र खरल करके प्रातःकाल घृतमें मिलाकर चाटनेसे राज-
यक्ष्मा, पांडु, उदररोग, बवासीर, श्वास, खाँसी, नेत्रजनित पीड़ा
और अनेक प्रकारके पित्तजनित रोग नष्ट होते हैं । इसको रज-
तादि लोह कहते हैं ॥ ९६ ॥
इति राजयक्ष्मचिकित्सा समाप्त ।