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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 311, कुल 584 में से

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पृष्ठ 311

भाषाटीकासहित । ( २८५ )
लोकेश्वरपोट्टली रस ।
भस्म सूताच्चतुर्थांशं मृतस्वर्णं प्रदापयेत् ।
द्विगुणं गन्धकं दत्त्वा मर्दयेच्चित्रकाम्बुना ॥ १८ ॥
पूर्या वराटिका तेन टङ्कणेन निरुध्य च ।
भाण्डे चूर्णप्रलिप्तेऽथ क्षिप्त्वा रुद्ध्वा च मृन्मये ॥१९॥
शोषयित्वा गजपुटे पुटेत्तु चापराह्निके ।
स्वांगशीतं समुद्धृत्य चूर्णयित्वा तु विन्यसेत् ।
एष लोकेश्वरो नाम वीर्यपुष्टिविवर्द्धनः ॥२०॥
गुंजाचतुष्टयञ्चास्य पिप्पलीमधुसंयुतम् ।
मारिचघृतयुक्तैश्च भक्षयेद्दिवसत्रयम् ।
अङ्गकार्श्येऽग्निमान्द्ये च कासे पित्ते क्षयेपि च ॥२१॥
पारदभस्म या रससिन्दूर ४ भाग; सोनेकी भस्म १ भाग और
गन्धक २ भाग लेवे । इन सबको चित्रककी जड़के रसमें खरल करके
कौड़ीमें भर देवे और उसका मुख सुहागेसे बन्द कर देवे । पश्चात्
एक सिकोरेमें चूनेका लेप करके पश्चात् उसमें कौड़ीको रखकर फिर
एक दूसरे सिकोरेसे ढक देवे । फिर उसकी अच्छे प्रकारसे कपड़मट्टी
करके सुखा लेवे । पश्चात् इसको दोपहरके बाद गजपुटमें रखकर फूंक
देवे । शीतल होनेपर कौड़ीको पीसकर चूर्ण कर ले । यह लोकेश्वर-
पोटली रस वीर्य और पुष्टीकी वृद्धि करनेवाला है, इसमेंसे चार रत्ती
परिमाण औषधि लेकर शहद पीपलके चूर्णके साथ सेवन करे । शरी-
रकी कृशता, मन्दाग्नि, खाँसी, पित्तरोग और क्षय रोगमें काली मिर-
चोंके चूर्ण और घृतके साथ तीन दिन तक सेवन करे ॥ १८-२१ ॥
लवणं वर्जयेत्तत्र साज्यं दधि च भोजयेत् ॥२२॥
एकविंशदिनं यावत्सघृतं मरिचं पिबेत् ।