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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 307

भाषाटीकासहित । (२८१)
साथ सेवन करे और ऊपरसे गूलर और घीका अनुपान करे । इसके
सेवन करनेसे रक्तपित्तरोग नष्ट होता है ॥ २३-२४ ॥
नीलोत्पलसिताक्षौद्रसंयुक्तं पद्मकेसरम् ।
तण्डुलोदकपानेन रक्तपित्तं नियच्छति ॥ २५ ॥
इति रसेन्द्रसारसंग्रहे रक्तपित्तचिकित्सा ।
नीलकमल अथवा नीलोत्पल ( नीलोफर ), मिश्री, शहद और
कमलकेशर यह सब औषधि समान भाग लेकर एकत्र खरल करके
चावलोंके जलके साथ सेवन करनेसे रक्तपित्तरोग नष्ट होता है ॥ २५ ॥
इति रक्तपित्तचिकित्सा ।
अथ यक्ष्माधिकार ।
रास्नादि लौह ।
रास्नाश्वगन्धाकर्पूरभेकपर्णीशिलाह्वयैः ।
त्रिकत्रयसमायुक्तैर्लोहं यक्ष्मान्तकृन्मतम् ॥ १ ॥
सर्वोपद्रवसंयुक्तमपि वैद्यविवर्जितम् ।
हन्ति कासं स्वराघातं राजयक्ष्म क्षतक्षयम् ॥
बलवर्णाग्निपुष्टीनां वर्द्धनं दोषनाशनम् ॥ २ ॥
रास्ना, असगंध, कपूर, मण्डूकपर्णी, शिलाजीत, हरड़, बहेडा,
आमला, सोंठ, मरिच, पीपल, चित्रक, नागरमोथा और वायविडंग यह
प्रत्येक एक एक भाग लेवे और सबकी बराबर लोहभस्म लेवे । इन
सब औषधियोंको एकत्र मिलाकर यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन
करनेसे समस्त उपद्रव युक्त, वैद्य करके छोडा हुआ राजयक्ष्म-
रोगी अवश्य आरोग्य होजाता है । इस औषधिके सेवन करनेसे
खाँसी, स्वरभेद, राजयक्ष्मा, क्षत और क्षयरोग नष्ट होते हैं; बल, वर्ण
अग्नि और पुष्टिकी वृद्धि होती है तथा त्रिदोषको नष्ट करता है ।
इसको रास्नादि लौह कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥