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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 584 में से

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पृष्ठ 30

( ४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
ह्के सूर्यकी समान प्रकाशवाला हो वह पारद् रसकर्ममें उत्तम माना
गया है । जो पारद् धूम्रवर्ण हो या सर्वतः पाण्डुवर्ण हो अथवा
चित्रित वर्णवाला हो वह रसकर्मके योग्य नहीं होता है ॥ ९ ॥
पारदमें स्वाभाविक दोष ।
नागो वङ्गो मलो वह्निश्चाञ्चल्यञ्च विषं गिरिः ।
असह्याग्निर्महादोषा निसर्गाः पारदे स्थिताः ॥ १० ॥
व्रणं कुष्ठं तथा जाड्यं दाहं वीर्यस्य नाशनम् ।
मरणं जडतां स्फोटं कुर्वन्त्येते क्रमान्नृणाम् ॥ ११ ॥
नाग ( सीसा ) वंग ( कलई ), मल, वह्नि, चांचल्य, विष, गिरि
और असह्याग्नि यह आठ महादोष पारदमें स्वभावसे स्थित रहते हैं ।
यदि इन दोषोंसे युक्त पारदको भक्षण किया जाय तो यह क्रमसे
व्रण, कुष्ठ, बुद्धिकी जडता, दाह, वीर्यका नाश, मृत्यु, शरीरका
जकड जाना और शरीरमें फोडे होना इन आठ प्रकारकी महाव्याधि-
योंको करता है ॥ १० ॥ ११ ॥
शोधनकी आवश्यकता ।
तस्माद्रसस्य संशुद्धिं विदध्याद्भिषजां वरः ।
शुद्धोऽयममृतः साक्षाद्दोषयुक्तो रसो विषम् ॥ १२ ॥
इस लिये वैद्यको चाहिये पहिले क्रमसे रस ( पारद् ) की शुद्धिको
करे अर्थात् उपरोक्त सम्पूर्ण दोषोंको निकालकर पारदको शुद्ध
करले क्योंकि शुद्ध किया हुआ पारद् साक्षात् अमृतके समान
गुणकारी होता है । और अशुद्ध पारद विषके समान शरीरको
कर डालता है ॥ १२ ॥
शुद्धाशुद्धके गुणदोष ।
दोषहीनो यदा सूतस्तदा मृत्युजरापहः ।
शुद्धोऽयममृतं साक्षाद्दोषयुक्तो रसो विषम् ॥ १३ ॥