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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 292

( २६६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
वातरक्तं तथा शोषं कण्डूं विस्फोटकापचीम् ।
नातः परतरं किञ्चित्कामलार्त्तिरुजापहम् ॥११॥
सिंग्रफमेंसे निकाला हुआ पारा, गंधक, केशर, लोहभस्म, ताम्र-
भस्म, कौड़ीकी भस्म, तुत्थ, हींग, हरड, बहेडा, आमला, थूहरका
दूध, जवारखार, जमालगोटे, दंतीकी जड और निसोध यह प्रत्येक
औषधि चार चार मासे लेकर बकरीके दूधमें पीसकर चार २ रत्तीकी
गोली बना लेवे । इन गोलियोंको शहदमें मिलाकर सेवन करे और
ऊपरसे थोडा जलपान करे । जो कफकी अधिकता हो तो एक
एक गोली बढ़ाकर खाये । इस औषधिसे कामला, पांडु, आ-
नाह, श्लीपद, गलगण्ड, गण्डमाला, व्रण, हलीमक, शोथ, शूल,
ऊरुस्तम्भ, संग्रहग्रहणी, वमन, मूर्च्छा, भ्रम, दाह, खांसी, श्वास,
गलग्रह, असाध्य सन्निपात, जीर्णज्वर, वातरक्त, शोष, कण्डू, विस्फो-
टक और अपची यह समस्त रोग नष्ट होते हैं । कामला रोगको
हरनेके लिये इससे उत्तम अन्य औषधि नहीं है । इसको प्राण-
वल्लभ रस कहते हैं ॥ ५-११ ॥
कामेश्वर रस ।
पलं सूतं पलं गन्धं पथ्याचित्रकयोः पलम् ।
मुस्तैलापत्रकाणाञ्च प्रतिसार्द्धं पलं क्षिपेत् ॥१२॥
त्र्यूषणं पिप्पलीमूलं विषञ्चापि पलं न्यसेत् ।
नागकेशरकं कर्षमेरण्डस्य पलं तथा ॥ १३ ॥
पुरातनगुडेनैव तुल्येनैव विमिश्रयेत् ।
मर्दयेत्कनकद्रावैर्भावयेच्च घृतान्विताम् ॥१४॥
वटिकां बदरास्थ्याभां कारयेद्भक्षयेन्निशि ।
पाण्डुरोगहरः सोऽयं रसः कामेश्वरःस्वयम् ॥ १५ ॥
पारा १ पल, गंधक १ पल, हरड १ पल, चित्रककी जड १ पल,
नागरमोथा, इलायची और तेजपात यह प्रत्येक औषधि डेढ़ डेढ़ पल,