रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (२५९)
छायामें सुखा देवे । धनिये और जीरेके अनुपानके साथ सेवन करनेसे
संग्रहणी, अर्श और समस्त क्रिमिरोग नष्ट होते हैं । यह अग्निको
अत्यन्त दीपन करनेवाला, तथा सूजन, गुल्म और प्लीहोदर रोगको
दूर करता है । संसारके हितके लिये श्रीमद्गहनानन्दनाथने यह कहा
है । इसको क्रिमिकालानल रस कहते हैं ॥ १-४ ॥
क्रिमिविनाश रस ।
शुद्धसूतं समं गन्धमभ्रं लोहं मनःशिला ।
धातकी त्रिफला लोध्रं विडंगं रजनीद्वयम् ॥ ५ ॥
भावयेत्सप्तधा सर्वं शृंगवेरभवै रसैः ।
चणमात्रां वटीं कृत्वा त्रिफलारससंयुताम् ॥ ६ ॥
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय क्रिमिरोगोपशान्तये ।
वातिकं पैत्तिकं हन्ति श्लैष्मिकञ्च त्रिदोषजम् ।
क्रिमिविनाशनामायं क्रिमिरोगकुलान्तकः ॥ ७ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, अभ्रकभस्म, लोहभस्म, मैनशिल,
धायके फूल, हरड़, बहेड़ा, आमला, लोध, वायविडंग, हलदी, दारु-
हलदी यह सब औषधि समान भाग लेकर अदरखके रसकी सात
भावना देकर चनेकी बराबर गोली बना लेवे । प्रातःकाल त्रिफलेके
रसके द्वारा सेवन करनेसे वातज, पित्तज, कफज और त्रिदोषज
क्रिमिरोग दूर होते हैं । यह क्रिमिरोगोंका नाशक है । इसको क्रिमि-
विनाश रस कहते हैं ॥ ५-७ ॥
क्रिमिरोगारि रस ।
सूतं गन्धं मृतं लोहं मरिचं विषमेव च ।
धातकी त्रिफला शुण्ठी मुस्तकं सरसाञ्जनम् ॥ ८ ॥
त्रिकटु मुस्तकं पाठा वालकं बिल्वमेव च ।
भावयेत्सर्वमेकत्र स्वरसैर्भृङ्गजैस्ततः ॥ ९ ॥