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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

भाषाटीकासहित । (२५७)
अग्निकुमार रस ।
टंकणं रसगन्धौ च समं भागत्रयं विषात् ।
कपर्दशंखयोर्द्व्यंशं वसुभागं मरीचकम् ।
दिनं जम्भारम्भसा पिष्टं वल्लमात्रं प्रदापयेत्॥१००॥
विषूचीशूलविष्टम्भवह्निमान्द्ये ज्वरे तथा ।
अजीर्णे संग्रहण्याञ्च सिद्धश्चाग्निकुमारकः ॥१०१॥
सुहागा,पारा और गंधक यह प्रत्येक एक २ भाग,विष तीन भाग,
कौडीकी भस्म और शंख भस्म तीन २ भाग, कालीमिरच ८ भाग इन
सब औषधियोंको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके
दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इसको विषूचिका, शूल, विष्टम्भ,
मंदाग्नि, ज्वर, अजीर्ण, संग्रहणी आदि रोगोंमें प्रयुक्त करे । इसको
अग्निकुमार रस कहते हैं ॥ १०० ॥ १०१ ॥
शंखवटी ।
द्वौ क्षारौ रसगन्धकौ सलवणौ क्षारेण तुल्यं विषं,
चिञ्चा शङ्खचतुर्गुणं रसवरैर्निम्पाकजातैः कृतम् ।
वारंवारमिदं सुपाकरचितं लौहं क्षिपेद्धिङ्गुके,
भूयष्टङ्कसमं सुमर्दितमिदं गुञ्जाप्रमाणं भजेत् ॥ २॥
ख्याता शङ्खवटी महाग्निजननी शूलान्तकृत्पाचनी,
कासश्वासविनाशिनी क्षयहरी मन्दाग्निसन्दीपनी ।
वातव्याधिमहोदरादिशमनी तृष्णामयोच्छेदिनी,
सर्वव्याधिनिषूदनी क्रिमिहरी दुष्टामयध्वंसिनी॥३॥
इति रसेन्द्रसारसंग्रहेऽजीर्णाधिकारः ।