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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 584 में से

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पृष्ठ 269

भाषाटीकासहित । (२४३)
धूर्त्तबीजस्य भस्मापि द्वात्रिंशद्भागसंयुक्तम् ।
कटुत्रयं त्रिभागं स्याल्लवंगैला च तत्समम् ॥ ३४ ॥
जातीफलं तथा कोषमर्द्धभागं नियोजयेत् ।
तथाऽर्द्धं लवणं पञ्च स्नुह्यर्कैरण्डतिन्तिडी ॥ ३५ ॥
अपामार्गाश्वत्थजञ्च क्षारं दद्याद्विचक्षणः ।
हरीतकी यवक्षारं स्वर्जिका हिंगुजीरकम् ॥ ३६ ॥
सूततुल्यं टङ्कणं च चाम्लयोगेन मर्दयेत् ।
भोजनान्ते प्रयोक्तव्यो गुञ्जाफलप्रमाणतः ॥ ३७ ॥
रसः पाशुपतो नाम सद्यः प्रत्ययकारकः ।
दीपनः पाचनो हृद्यः सद्यो हन्ति विषूचिकाम्॥३८॥
पारा १ भाग , गंधक २ भाग, लोहाभस्म ३ भाग और विष छः
भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर चित्रकके रसमें भावना
देकर सुखा लेवे । फिर इसमें ३२भाग धतूरेके बीजोंकी भस्म, त्रिकुटेका
चूर्ण ३ भाग, लौंग ३ भाग, इलायची ३ भाग, जायफल आधा भाग,
जावित्री आधा भाग, पांचों नमक प्रत्येक आधा आधा भाग तथा
थूहर, आक, अरण्ड, इमली, चिरचिटा और पीपल इन प्रत्येकका क्षार
एक एक भाग लेवे । फिर हरड़, जवाखार, सज्जी, हींग, जीरा और
सुहागा यह समस्त औषधि प्रत्येक एक एक भाग मिलाकर पूर्वोक्त
अम्लवर्गकी औषधियोंमें खरल करे । भोजनके पश्चात् इसमेंसे एक
रत्ती परिमाण औषधि सेवन करनी चाहिये। यह औषधि तत्काल गुण-
दायक है; अग्निको दीपन करनेवाली, पाचक, हृदयको हितकारी और
तत्काल विषूचिका रोगको दूर करती है ॥ ३३-३८ ॥
तालमूलीरसेनैव उदरामयनाशनः ।
मोचरसेनातिसारं ग्रहणीं तक्रसैन्धवैः ॥ ३९ ॥