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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 584 में से

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पृष्ठ 259

भाषाटीकासहित । ( २३३ )
मानकन्द, जमींकंद, भिलावे, निसोध, दन्तीमूल, सोंठ, मिरच,
पीपल, हरड़, बहेड़ा, आमला, तेजपात, दालचीनी और इलायची यह
सब औषधि समान भाग लेवे और सबके बराबर लोहा लेवे; इन
सबको एकत्र करके जलमें पीसकर गोली बना लेवे । प्रतिदिन इस-
मेंसे यथामात्रानुसार उचित अनुपानके साथ सेवन करे तो बवासीर
नष्ट होती है ॥ २० ॥
चंचुकुठार रस ।
रसगन्धकलौहानां प्रत्येकं भागयुग्मकम् ।
दन्तित्रिकटुकुष्ठैकं षड्भागं लाङ्गलस्य च ॥ २१ ॥
क्षारसैन्धवटङ्गानां प्रत्येकं भागपञ्चकम् ।
गोमूत्रस्य च द्वात्रिंशत्स्नुहीक्षीरं तथैव च ॥ २२ ॥
यावच्च पिण्डितं सर्वं तावन्मृद्वग्निना पचेत् ।
माषद्वयं ततः खादेद्दिवास्वप्नादि वर्जयेत् ।
रसश्चञ्चुकुठारोऽयमर्शासां कुलनाशनः ॥ २३ ॥
पारा दो भाग,गंधक दो भाग और लोहेकी भस्म दो भाग लेवे;
सोंठ, मरिच, पीपल, दंतीकी जड़, कूठ और कलिहारी यह प्रत्येक
औषधि छः छः भाग लेवे; जवाखार, सेंधानमक और सुहागा यह प्रत्येक
पांच पांच भाग, गोमूत्र और थूहरका दूध प्रत्येक बत्तीस २ भाग
लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके मंद मंद अग्निसे तब-
तक पकावे जबतक कि औषधिका गोला न हो जाय । प्रतिदिन इस-
मेंसे दो मासे औषधि खाये और इसपर दिनमें सोना आदि त्याग
देवे । यह चंचुकुठार रस बवासीरको समूल नष्ट करता है ॥२१-२३॥
शिलागन्धक वटक ।
शिलागन्धकयोश्चूर्णं पृथग्भृङ्गरसाऽऽप्लुतम् ।
सप्ताहं भावयेत्सर्पिर्मधुभ्याञ्च विमर्दयेत् ॥२४॥