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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 584 में से

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पृष्ठ 243

भाषाटीकासहित । ( २१७ )
हिरनके सींगमें भर देवे और ऊपरसे मृत्तिकादि बन्द करके मध्यम
रीतिसे पुटपाक करे । जब शीतल हो जाये तब सींगमेंसे औषधि
निकालकर खिरेंटीकी जड़के रसमें सात तथा चिरचिटा, लोध, अतीस,
नागरमोथा, धायके फूल, इद्रजौ और गिलोय इन प्रत्येकके रसके
द्वारा तीन तीन भावना देवे । इसमेंसे एक मासे औषधि लेकर शहद
और काली मिरचोंके चूर्णमें मिलाकर सेवन करनेसे अतीसार और
सर्वदोषजग्रहणीरोग नष्ट होता है, अग्नि दीप्त होती है । यह रस
ग्रहणीकपाट रसके समान गुणोंवाला है ॥ ९७-१०१ ॥
पानीयभक्तवटी ।
कृष्णाऽभ्रलोहमलशुद्धविडङ्गचूर्णं प्रत्येकमेव पलिकं
विधिवद्विधाय । चव्यं कटुत्रयफलत्रयकेशराजदंती-
पयोदचपलाऽनलघण्टकर्णाः ॥ २ ॥ माणोलकुञ्च-
बृहतीत्रिवृताः ससूर्यावर्त्ताः पुनर्नविकया सहिता-
स्त्वमीषाम् । मूलं प्रतिप्रतिविशोधितमक्षमेकं चूर्णं
तदर्द्धरसगन्धकमेकसंस्थम् ॥ ३ ॥ कृत्वाऽऽर्द्रकीय-
रससंवलितञ्च भूयः सम्पेष्य तस्य वटिका विधि-
वद्विधेया । हन्त्यम्लपित्तमरुचिं ग्रहणीमसाध्यां
दुर्नामकामलभगन्दरशोथगुल्मान् ॥ ४ ॥ शूलञ्च
पाकजनितं सतताग्निमान्द्यं सद्यः करोत्यपचितिं
चिरनष्टवह्नेः । कुष्ठं निहन्ति पलितञ्च वलिं प्रवृद्धां
श्वासं च कासमपि पाण्डुगदं निहन्ति ॥ ५ ॥
काले अभ्रककी भस्म १ पल, मण्डूर १ पल, वायविडंगका चूर्ण
१ पल, चव्य, सोंठ, पीपल, मरिच, हरड़, बहेड़ा, आमला, कुकुर-
भांगरा, दंतीमूल, नागरमोथा, पीपल, चित्रकमूल, घण्टाकर्ण, मानकंद,
बडहर, कटेरी, निशोथ, हुलहुल और पुनर्नवा प्रत्येकका मूल चूर्ण एक