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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 239, कुल 584 में से

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पृष्ठ 239

भाषाटीकासहित । ( २१३ )
पारा और गंधक दोनोंको समान भाग लेकर कज्जली बनावे फिर
अदरखके रसमें खरल करके सुखालेवे । फिर इसमें दुगुनी कुड़ेकी
छालकी भस्म मिला लेवे; सबको अच्छे प्रकारसे खरल करके चार
रत्ती परिमाण औषधि बकरीके दूधके साथ अथवा कुड़ेकी छालके
क्वाथके साथ सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् मसूं-
रका यूष और शालि चावलोंका भात शीतल करके भोजन करे ।
रक्तातिसार रोगमें इस औषधिको दहीके साथ दो रत्ती परिमाण
सेवन करे और क्रमसे एक एक रत्ती प्रति दिन बढ़ाता जाय ।
जब दश रत्ती परिमाण होजाये तब फिर एक एक रत्ती परिमाण
घटाता जाये । इस औषधिके सेवन करनेसे सब प्रकारका संग्रहणी
रोग और मन्दाग्नि दूर होते हैं ॥ ८२-८५ ॥
विजयावटिका ।
हाटकं रजतं ताम्रं यद्यत्र परिदीयते ।
विजयाख्या तु सा ज्ञेया सर्वरोगनिषूदनी ॥ ८६ ॥
यदि उपरोक्त औषधिमें पारेकी बराबर सोनेकी भस्म, चांदीकी
भस्म और तांबेकी भस्म मिलाकर गोली बना लेवे । इसको विजया-
वटिका कहते हैं । यह विजयावटिका पूर्वोक्त गुणोंवाली और सम्पूर्ण
रोगोंको दूर करती है ॥ ८६ ॥
ग्रहणीकपर्दपोट्टली ।
कपर्दतुल्यं रसकं तु गन्धकं लोहं मृतं टंकणकञ्च
तुल्यम् । जयारसैनैकदिनं विमर्द्य चूर्णेन संवेष्ट्य
पुटेच्च भाण्डे ॥ ददीत तत्पोट्टलिकाभिधानं वात-
प्रधानां ग्रहणीं निहन्ति ॥ ८७ ॥
कौड़ीकी भस्म, पारा, गंधक, लोहभस्म और सुहागा इन सब
औषधियोंको एकत्र भांगके पत्तोंके रसमें एकदिन खरल करके गोला-