रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
रखके रसमें भावना देवे । इस औषधिको छः मासे शहदके साथ सेवन
करे । यह अत्यन्त अग्निप्रदीपक और संग्रहणी रोगको दूर करता है ।
इसको अग्निकुमार रस कहते हैं ॥ ६७-७० ॥
वडवामुख रस ।
शुद्धसूतं समं गन्धं मृतताम्राभ्रटङ्कणम् ।
सामुद्रञ्च यवक्षारं स्वर्जिसैन्धवनागरम् ॥ ७१ ॥
अपामार्गस्य च क्षारं पलाशवरुणस्य च ।
प्रत्येकं सूततुल्यं स्यादम्लयोगेन मर्दयेत् ॥ ७१ ॥
हस्तिशुण्डीद्रवैश्चाग्नौ मर्दयित्वा पुटेल्लघु ।
माषमात्रः प्रदातव्यो रसोऽयं वडवामुखः ।
ग्रहणीं विविधां हन्ति संग्रहग्रहणीं ज्वरम् ॥ ७३ ॥
पारा, गंधक, तांबा भस्म, अभ्रक भस्म, सुहागा, समुद्रलवण, जवा-
खार, सज्जी, सेंधानमक, सोंठ, चिरचिटेका खार, ढाकका खार और
वरनेका खार इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर कांजीमें खरल
करे । फिर इसको हाथीशुंडीके रसमें खरल करके लघु पुटमें पकावे ।
एक मासे भर इस औषधिका सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे
ग्रहणी, संग्रहणी और ज्वर नष्ट होते हैं ॥ ७१-७३ ॥
ग्रहणीकपाट रस ।
रसगन्धकयोश्चापि जातीफललवङ्गयोः ।
प्रत्येकं शाणमानञ्च श्लक्ष्णचूर्णीकृतं शुभम् ॥ ७४ ॥
सूर्यावर्त्तरसेनैव बिल्वपत्ररसेन च ।
शृङ्गाटकसमुद्भूतस्वरसेन च मर्दयेत् ॥ ७५ ॥
चण्डातपेन संशोष्य वटिकां कारयेद्भिषक् ।
बिल्वपत्ररसेनैव दापयेद्रक्तिकाद्वयम् ॥ ७६ ॥