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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 584 में से

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पृष्ठ 226

( ३०० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
सबको एकत्र पीसकर दो दो मासेकी गोली बना लेवे। एक एक
गोली तक्रके साथ सेवन करे। इस औषधिके सेवन करनेसे संग्र-
हणी, शूल, दाह ज्वर, वमन, भ्रम और संग्रहणी प्रभृति समस्त
रोग नष्ट होते हैं। यह अत्यन्त अग्निप्रदीपक है। इसको पूर्णकला
वटी कहते हैं ॥ १७–२१ ॥
वज्रकपाट रस ।
पारदं गन्धकञ्चैव अहिफेनं समोचकम् ।
त्रिकटु त्रिफलं चैव सममेकत्र कारयेत् ॥ २२ ॥
भङ्गं भृङ्गद्रवैश्चैतद्भावयेच्च पुनः पुनः ।
रक्तित्रयं ततश्चास्य मधुना सह भक्षयेत् ॥
असाध्यां ग्रहणीं हन्ति रसो वज्रकपाटकः ॥ २३ ॥
पारा, गंधक, अफीम, मोचरस, त्रिकुटा और त्रिफला यह सब
औषधि समान भाग लेकर एकत्र खरल करके भांगके पत्तोंके रसमें और
भांगरेके पत्तोंके रसमें सात सात भावना देवे । इस औषधिका तीन
रत्ती परिमाण शहदके साथ सेवन करनेसे असाध्य भी ग्रहणीरोग दूर
होता है। इसको वज्रकपाट रस कहते हैं ॥ २२ ॥ २३ ॥
जातीफल रस ।
पारदाभ्रकसिन्दूरं गन्धं जातीफलं समम् ।
कुटजस्य फलं चैव धूर्तबीजानि टङ्कणम् ॥ २४ ॥
व्योषं मुस्ताऽभया चैव चूतबीजं तथैव च ।
बिल्वं सर्जरसं चैव दाडिमीफलवल्कलम् ॥ २५ ॥
एतानि समभागानि निःक्षिपेत् खल्लमध्यतः ।
विजयास्वरसेनैव मर्दयेच्छ्लक्ष्णचूर्णितम् ॥ २६ ॥
गुञ्जाफलप्रमाणान्तु वटिकां कारयेद्भिषक् ।
एकां कुटज-मूल-त्वक्कषायेण प्रयोजयेत् ॥ २७ ॥