रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १९४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
गोलियोंके सेवन करनेसे त्रिदोषज अतिसार और संग्रहणी रोग नष्ट
हो जाते हैं । दोषानुसार इसके अनुपानकी कल्पना करे । इसको
चिन्तामणि रस कहते हैं ॥ १६-२० ॥
अहिफेनवटिका ।
अहिफेनं सखर्जूरं घृष्ट्वा गुञ्जैकमात्रकम् ।
रक्तस्रावमतीसारमतिवृद्धं विनाशयेत् ॥ २१ ॥
अफीम और छुहारा इन दोनोंको एकत्र पीसकर एक एक रत्तीकी
गोली बनाकर सेवन करनेसे रक्तातीसार, रुधिरका स्राव और सब
प्रकारके अत्यन्त बढ़े हुए अतिसार नष्ट होते हैं ॥ २१ ॥
महागन्धक ।
रसगन्धकयोः कर्ष ग्राह्यमेकं सुशोधितम् ।
ततः कज्जलिकां कृत्वा मृदुपाकेन साधयेत् ॥२२॥
जातीफलं तथा कोषं लवङ्गारिष्टपत्रके ।
सिन्धुवारदलञ्चैव एलाबीजं तथैव च ॥ २३ ॥
एषां च कर्षमात्रेण तोयेनाथ विमर्दयेत् ।
मुक्तागृहे पुनः स्थाप्यं पुटपाकेन साधयेत् ॥२४॥
घनपङ्कैर्बहिर्लिप्त्वा पुटमध्ये निधापयेत् ।
गुञ्जाष्टकप्रमाणेिन प्रत्यहं भक्षयेन्नरः ॥ २५ ॥
शुद्ध पारा एक तोला, शुद्ध गंधक एक तोला लेवे; फिर इन दोनोंको
एकत्र पीसकर कज्जली बना लेवे । फिर रसपर्पटीके समान इसको
मृदुपाकसे पकाकर इसमें जायफल, जावित्री, लौंग, नीमके पत्ते,
सम्हालूके पत्ते और इलायची यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला
मिलाकर जलमें पीस गोला बनाकर दोसीपियोंमें बन्दकर २-३ अंगुल
मोटी कपड़मिट्टीकर मृदुपुटपाकसे पकाकर ६ रति परिमाण प्रतिदिन
सेवन करे ॥ २२-२५ ॥