रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १९२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
अजादुग्धेन वा पेयं जम्बुत्वक्साधितं रसम् ।
अतीसारे ज्वरे घोरे ग्रहण्यामरुचौ तथा ॥११॥
सामे सशूले रक्ते च पिच्छास्रावे भ्रमे तथा ।
शोथे रक्तातिसारे च संग्रहग्रहणीषु च ॥ १२ ॥
पारा १ तोला, गन्धक १ तोला, अभ्रकभस्म १ तोला, लोहभस्म
१ तोला, कौड़ीकी भस्म १ तोला, चांदीकी भस्म १ तोला और
अतीस १ तोला इन सब औषधियोंको अच्छे प्रकारसे खरल करे;
पश्चात् धनिये और सोंठके क्वाथमें अलग अलग भावना देवे। फिर
एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । पश्चात् प्रातःकाल उठकर प्रथम
गुरु, देव और ब्राह्मणोंकी पूजा करके इस औषधिका सेवन करे ।
पश्चात् भुने हुए बेल, गुड़, अथवा बकरीका दूध और जामुनकी
छालके रसका अनुपान करे । इस औषधिके भक्षण करनेसे अतिसार,
घोर ज्वर, ग्रहणी, अरुचि, आमशूल, रक्तस्राव, आँव, भ्रम, शोथ,
रक्तातीसार और संग्रहणीरोग नष्ट होते हैं । इसको बृहद्गगन-
सुन्दर रस कहते हैं ॥ ८-१२ ॥
लोकनाथ रस ।
भस्म सूतस्य भागैकं चत्वारः शुद्धगन्धकात् ।
क्षिप्त्वा वराटिकागर्भे टंकणेन निरुध्य च ॥ १३ ॥
भाण्डे रुद्ध्वा पुटे पाच्यं स्वांगशीतं समुद्धरेत् ।
लोकनाथरसो नाम क्षौद्रैर्गुञ्जाचतुष्टयम् ॥१४॥
नागरातिविषा मुस्तं देवदारु वचान्वितम् ।
कषायमनुपानन्तु सर्वातीसारनाशनः ॥ १५ ॥
पारद भस्म या रससिंदूर १ भाग, शुद्ध गन्धक ४ भाग इन
दोनोंको खरल करके कौड़ियोंमें भरकर और सुहागेसे कौड़ियोंके
मुखको बंद करके मूषामें रखकर पुटपाक करे । स्वांग शीतल होनेपर