रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १८७ )
सोंठ, पीपल, कालीमिरच, चित्रककी जड़, जीरा और वायविडंग यह
प्रत्येक औषधि एक एक भाग ले सबको एकत्र पीसकर पूर्वोक्त औष-
धिमें मिला देवे। इसमेंसे एक मासे परिमाण औषधि लेकर सब प्रकारके
अतिसारोंमें प्रयोग करना चाहिये । इससे ज्वरातिसार,अतिसार,शूला-
तिसार, रक्तातिसार,निरामातिसार, शोथयुक्तातिसार, त्रिदोषज ग्रहणी
और सब प्रकारके गुदज रोग नष्ट होते हैं । यह औषधि विना अनु-
पानकेभी कार्यको सिद्ध कर सकती है ॥ ३०-३३ ॥
बृहत्कनकसुन्दर रस ।
शुद्धसूतं समं गन्धं मरिचं टङ्कणं तथा ।
स्वर्णबीजं समं मर्द्यं भार्ङ्गीद्रावैर्दिनार्द्धकम् ॥ ३४ ॥
सूततुल्यं मृतञ्चाभ्रं रसः कनकसुन्दरः ।
अस्य गुञ्जाद्वयं हन्ति पित्तातीसारमुग्रकम् ॥ ३५ ॥
पारा, गंधक, कालीमिरच, सुहागा और धतूरेके बीज यह सब
औषधि समान भाग लेकर भारंगीकी जड़के रसमें दो प्रहर तक
खरल करे, फिर पारेकी बराबर इसमें अभ्रकभस्म मिलाकर दो दो
रत्तीकी गोली बना लेवे । इससे उग्र पित्तातिसार नष्ट होता है । इसको
बृहत्कनकसुंदर रस कहते हैं ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
मृतसञ्जीवन रस ।
रसगन्धौ समौ ग्राह्यौ सूतपादं विषं क्षिपेत् ।
सर्वतुल्यं मृतञ्चाभ्रं मर्द्यं धूस्तूरजैर्द्रवैः ॥ ३६ ॥
सर्पाक्ष्याश्च द्रवैर्यामं कषायेणाथ भावयेत् ।
धातक्यतिविषा मुस्तं शुण्ठी जीरकवालकम् ॥३७॥
यमानी धान्यकं बिल्वं पाठा पथ्या कणान्वितम् ॥
कुटजस्य त्वचं बीजं कपित्थं बालदाडिमम् ॥३८॥