रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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प्रत्येकके रसमें अलग अलग भावना देवे । फिर इसमें एक तोला
कालीमिरचोंका चूर्ण और सुहागा छः मासे इन सबको मिलाकर रगड़े,
फिर धूपमें सुखा लेवे और मटरके समान इसकी गोली बना लेवे ।
रोगीकी आयु, अग्नि और बलाबलका विचार कर यथायोग्य अनु-
पानके साथ प्रयोग करनेसे खाँसी, क्षय, श्वास और वातकफजनित
पीड़ा दूर होती है । वाजीकरणमें इससे उत्तम अन्य औषधि नहीं है ।
इससे बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है, ज्वर और अती-
साररोगकी यह सिद्ध औषधि है । रसायन कार्यमें इस औषधिसे
उत्तम अन्य औषधि नहीं है । इस औषधिके भक्षण करनेसे भोजन
और शयनादिका कुछ परिहार नहीं है । इसपर अवश्य दही भक्षण
करना चाहिये । इस औषधिको नागार्जुन मुनिने कहा है। इसको
अभ्रवाटिका कहते हैं ॥ १६-२५ ॥
कनकसुन्दर रस ।
हिंगुलं मरिचं गन्धं टंकणं पिप्पली विषम् ।
कनकस्य च बीजानि समांशं विजयाद्रवैः ॥ २६ ॥
मर्दयेद्याममात्रन्तु चणमात्रा वटी कृता ।
भक्षणाद्ग्रहणीं हन्ति रसः कनकसुन्दरः ।
अग्निमान्द्यं ज्वरं तीव्रमतिसारञ्च नाशयेत् ॥ २७ ॥
सिंग्रफ, कालीमिरच, गंधक, सुहागा, पीपल, विष और काले धतूरेके
बीज यह सब औषधि समान भाग लेव; पश्चात् भांगके पत्तोंके रसमें
एक प्रहर उत्तम रीतिसे खरल करके चनेकी बराबर गोली बना लेवे ।
इस औषधिके भक्षण करनेसे संग्रहणी, मंदाग्नि ज्वर और अतीसार
रोग नष्ट होते हैं । इसको कनकसुन्दर रस कहते हैं ॥ २६ ॥ २७ ॥
कनकप्रभा ।
सुवर्णबीजं मरिचं मरालपादं कणा टंकणकं विषञ्च ।
गन्धं जयाद्भिर्दिवसं विमर्द्य गुञ्जाप्रमाणां वटिकां