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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 196

( १७० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
दो अथवा तीन रत्ती परिमाण गायके दूधके साथ इस औषधिका
सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे रात्रिज्वर नष्ट होता है ।
इसको विश्वेश्वर रस कहते हैं ॥ ३०७ ॥ ३०८ ॥
त्र्याहिकारि रस ।
रसेन गन्धं शंखञ्च शिखिग्रीवञ्च पादिकम् ।
गोजिह्वया जयन्त्या च तण्डुलीयैश्च भावयेत्॥३०९॥
प्रत्येकं सप्त सप्ताथ शुष्कं गुञ्जाचतुष्टयम् ।
जरणेन घृतेनाद्यात् त्र्याहिकज्वरशान्तये ॥३१० ॥
पारा ४ भाग, गन्धक, शंखभस्म और तूतिया एक एक भाग
लेवे । इन प्रत्येकके रसमें अलग अलग सात वार भावना देकर चार
चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको जीरेके चूर्ण और घृतके
साथ सेवन करनेसे त्र्याहिक ज्वर नष्ट होता है ॥ ३०९ ॥ ३१० ॥
चातुर्थिकारि रस ।
हरितालं शिलां तुत्थं शंखचूर्णञ्च गन्धकम् ।
समांशं मर्दयेत्प्राज्ञः कुमारीरसभावितम् ॥ ११ ॥
शरावसंपुटे कृत्वा पश्चाद्गजपुटे पचेत् ।
कुमारिकारसेनैव वल्लमात्रा वटी कृता ॥ १२ ॥
दत्ता शीतज्वरं हन्ति चातुर्थिकं विशेषतः ।
मरीचघृतयोगेन तक्रं पीत्वा चरेद्वटीम् ॥
एतया वमनं भूत्वा ज्वरश्शीघ्रं विनश्यति ॥ १३ ॥
हरिताल, मैनशिल, तूतिया, शंख और गन्धक यह सब द्रव्य
समान भाग लेकर घीक्वारके रसमें एकत्र खरल करे । फिर इसको
शरावसम्पुटमें रखकर गजपुटमें पकावे । फिर घीक्वारके रसमें खरल