रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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लेकर जलसे दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। इसको चिन्तामणि रस
कहते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे आठ प्रकारका ज्वर नष्ट
होता है ॥ ६१ ॥ ६२ ॥
त्रैलोक्यचिन्तामणि रस ।
भागत्रयं स्वर्णभस्म द्विभागं तारमभ्रकम् ।
लोहात्पञ्च प्रवालञ्च मौक्तिकत्रयसम्मितम् ॥ ६३ ॥
भस्मसूतं सप्तकञ्च सर्वं मर्द्यं तु कन्यया ।
छायाशुष्का वटी कार्या छागीदुग्धानुपानतः ॥६४॥
क्षयं हन्ति तथा कासं गुल्मं चापि प्रमेहनुत् ।
जीर्णज्वरहरश्चायमुन्मादन्तु निकृन्तति ॥
सर्वरोगहरश्चापि वारिदोषनिवारणः ॥ ६५ ॥
सोनाभस्म ३ भाग, चांदीभस्म २ भाग, अभ्रकभस्म २ भाग,
लोहभस्म ५ भाग, मूंगा भस्म ५ भाग, मोती भस्म ३ भाग और
रससिन्दूर या पारद भस्म सात भाग इन सब औषधियोंको एकत्र घृत-
कुमारी ( घीक्वार ) के रसमें उत्तम रीतिसे खरल करके दो दो रत्तीकी
गोली बना छायामें सुखा लेवे । इस औषधिको बकरीके दूधके साथ
सेवन करनेसे क्षय, खाँसी, गुल्म, प्रमेह, जीर्णज्वर, उन्माद, वारिदोष
आदि समस्त रोग नष्ट होते हैं । इसको त्रैलोक्यचिन्तामणि रस
कहते हैं ॥ ६३–६५ ॥
रसं गन्धं विषञ्चैव त्रिकटु त्रैफलन्तथा ।
शिलाह्वा रौप्यकं स्वर्णं मौक्तिकं तालकं समम्॥६६॥
मृगकस्तूरिकायाश्च ग्राह्यं षाण्माषिकं भिषक् ।
भृङ्गराजरसेनैव तुलस्याः स्वरसेन वा ॥ ६७ ॥
आर्द्रकस्य रसेनैव वटीं कुर्याद्द्विगुञ्जिकाम् ।
चिन्तामणिरसो ह्येष सर्वरोगकुलान्तकः ॥ ६८ ॥