रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 177, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १५१ )
अथ जीर्णज्वर विषमज्वर चिकित्सा ।
अथ विषमज्वर लक्षण ।
यः स्यादनियतात्कालाच्छीतोष्णाभ्यां तथैव च ।
वेगतश्चापि विषमः स ज्वरो विषमः स्मृतः॥२०६॥
जिस ज्वरमें ज्वरके आगमनका समय अनियमत हो, तथा शीत
और उष्णता भी अनियत हो और ज्वर कभी समान स्थितिमें स्थित
नहीं होय उसको विषमज्वर कहते हैं ॥ २०६ ॥
जीर्णज्वरके लक्षण ।
त्रिसप्ताहव्यतीतस्तु ज्वरो यस्तनुतां गतः ।
प्लीहाग्निसार्दं कुरुते स जीर्णज्वर उच्यते ॥ २०७ ॥
इक्कीस २१ दिन तक भी जो ज्वर नहीं पके किंतु सूक्ष्म होजाये
तथा मंदाग्नि और प्लीहा आदि रोग उत्पन्न होजायँ तो उसको जीर्णज्वर
कहते हैं ॥ २०७ ॥
ज्वरांकुश रस ।
रसस्य द्विगुणं गन्धं गन्धतुल्यञ्च टंकणम् ।
रसतुल्यं विषं योज्यं मरिचं पंचधा विषात्॥२०८॥
कट्फलं दन्तिबीजञ्च प्रत्येकं मरिचोन्मितम् ।
ज्वरांकुशो रसो नाम मर्दयेद्याममात्रकम् ।
माषेकेन निहन्त्याशु ज्वरं जीर्णं त्रिदोषजम्॥२०९॥
पारा १ भाग, गंधक २ भाग, सुहागा २ भाग, विष १ भाग,
काली मिरच, कायफल और जमालगोटे यह तीनों पांच पांच भाग,
इन सबको एकत्र करके एक प्रहर तक खरल करे । इस औषधिके
१ मासा सेवनसे त्रिदोषज जीर्णज्वर नष्ट होता है । इसको जीर्णज्वरां-
कुश रस कहते हैं ॥ २०८-२०९ ॥