रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १४७ )
सन्निपातहर रस ।
सूतं गंधं टंकणं वै मरीचं व्योषं तद्वद्धस्तिनः
पिप्पली च । सर्वं तुल्यं धूर्तनीरैः प्रपेष्य व्योष-
क्षोदैर्कनीरैर्द्विगुञ्जम् ॥ ८८ ॥
पारा, गंधक, सुहागा, कालीमिरच, गजपीपल और त्रिकुटा यह
सब औषधि समानभाग लेकर एकत्र धतूरेके पत्तोंके रसमें खरल करके
दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंको आकके क्वाथ और
त्रिकुटेके चूर्णके साथ सेवन करनेसे सन्निपातज्वर नष्ट होता है ॥ ८८ ॥
सन्निपात वडवानल रस ।
रसस्याष्टौ सप्त विषात् षट् षड् गन्धालयोस्तथा ।
दन्तीबीजानि षड् भागाः पंचभागन्तु टङ्कणम्॥८९॥
चत्वारि धूर्तबीजस्य त्रयस्त्रिकटुकस्य च ।
एतानि वह्निमूलस्य क्वाथेन परिमर्दयेत् ॥ ९० ॥
आर्द्रकस्य रसेनाथ देयं गुंजाद्वयं हितम् ।
वडवानलसंज्ञोऽयं सन्निपातहरः परः ॥ ९१ ॥
पारा ८ भाग, विष ७ भाग, गन्धक ६ भाग, हरिताल ६ भाग,
जमालगोटे ६ भाग, सुहागा ५ भाग, धतूरेके बीज ४ भाग और त्रिकुटा
३ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र चीतेके क्वाथमें खरल करके दो
दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंको अदरखके रसके साथ
सेवन करे । यह वडवानल रस सन्निपातज्वरको नष्ट करता है॥८९-९१॥
सिंहनाद रस ।
लोहपात्रगते गन्धे द्राविते तत्र निक्षिपेत् ।
शुद्धसूतं समं चाभ्रं भार्गीद्रावं तयोः समम् ॥ ९२ ॥
निर्गुण्डयाः पल्लवोत्थञ्च तुल्यं तुल्यं प्रदापयेत् ।
पचेन्मृद्वग्निना तावद्यावच्छुष्कं द्रवं द्वयम् ॥९३॥