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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 164

( १३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
सूचिकाभरणो नाम भैरवेण प्रकीर्तितः ।
सूचिकाग्रेण दातव्यः सन्निपातनिबर्हणः ॥ ४७ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, सीसाभस्म, स्थावर और जंगम विष
( सिंगिया विष और गरल ) यह सब औषधि समान भाग लेकर
एकत्र मछलीके पित्त, सुअरके पित्त, मोर और बकरेके पित्तमें अलग
अलग भावना देवे । इसको सूचिकाभरण रस कहते हैं । यह औषधि
स्वयं भैरवने कही है । इस औषधिमेंसे सुईके अग्रभागकी बराबर
सेवन करे । यह सन्निपातको नष्ट करती है, इसको कोई सूचीसे शरी-
रमें लगाते हैं ॥ ४६ ॥ ४७ ॥
पञ्चानन रस ।
शम्भोः कण्ठविभूषणं समरिचं दैत्येन्द्ररक्तं रविः,
पक्षौ सागरलोचनं शशियुगं भागोऽर्कसंख्यान्वितः।
खल्ले तत्परिमर्दितं रविजलैर्गुञ्जैकमात्रं ददेत्,
सिंहोऽयं ज्वरदंतिदर्पदलनः पंचाननाख्यो रसः४८॥
विष २ भाग, कालीमिरच ७ भाग, शुद्ध गंधक २ भाग, सिंगरफ
२ भाग और तांबाभस्म १२ भाग इन सब औषधियोंको आकके
मूलके रसमें अच्छे प्रकारसे खरल करके एक एक रत्तीकी गोली
बना लेवे । इसको पञ्चानन रस कहते हैं, ज्वररूपी मत्तहस्तीके दर्पको
दलनेके लिये यह औषधि सिंहके समान है ॥ ४८ ॥
त्रिदोषनीहाररवि रस ।
रसेन गन्धं द्विगुणं कृशानुरसैर्विमर्द्याष्टदिनानि
घर्मे । रसाष्टभागं त्वमृतं च दद्याद्विमर्दयेद्वह्निरसेन
किंचित् ॥ पिबेत्तु सम्भावित एष देय-
स्त्रिदोषनीहारविनाशसूर्यः ॥ ४९ ॥