रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 161, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १३५ )
इस औषधिके सेवन करनेसे एक प्रहरमें घोरतर नवीनज्वर नष्ट हो
जाता है । इस औषधि पर मिश्री, दही और भात भोजन करे ।
इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् शीतल जल पीवे तथा गन्नेका
रस और मूंगका यूष इस पर अत्यन्त हितकारी है । इसको शीतभंजी
रस कहते हैं । यह शीतभंजी रस सब प्रकारके ज्वरोंको अन्तक-
स्वरूप है ॥ २९-३१ ॥
उन्मत्त रस ।
रसं गन्धञ्च तुल्यांशं धूस्तूरफलजैर्द्रवैः ।
मर्दयेद्दिनमेकन्तु तुल्यं त्रिकटुकं क्षिपेत् ।
उन्मत्ताख्यो रसो नाम रस्यः स्यात्सन्निपातजित् ३२
सन्निपातार्णवे मग्नं योऽभ्युपैति च रोगिणम् ।
कस्तेन न कृतो धर्मः काञ्च पूजां न सोऽर्हति ॥३३॥
पारा १ भाग और गंधक १ भाग लेवे, दोनोंको एकत्र धतूरेके
फलोंके रसमें एक दिन खरल करे । फिर उसमें समान भाग
त्रिकुटा मिलाकर अच्छे प्रकारसे खरल करे । इसको उन्मत्त रस कहते
हैं । इसकी नस्य ग्रहण करनेसे सन्निपात ज्वर नष्ट होजाता है । जो
वैद्य इस सन्निपातरूपी समुद्रमें निमग्न हुए रोगीका उद्धार करता है
उसने कौनसा धर्म नहीं किया और वह कौनसी पूजाके योग्य
नहीं है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥
मृतसञ्जीवन रस ।
म्लेच्छस्य भागाश्चत्वारो जैपालस्य त्रयो मताः ।
द्वौ भागौ टंकणस्यैव भागैकममृतस्य च ॥ ३४ ॥
तत्सर्वं मर्दयेच्छ्लक्ष्णं शुष्कं यामं भिषग्वरः ।
शृङ्गवेराम्बुना देयं व्योषचित्रकसैन्धवैः ॥ ३५ ॥
माषद्वयमितन्तापं हरत्येव विनिश्चयः ।
घनसारण सारेण चन्दनेन विलेपनम् ॥ ३६ ॥