रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 156, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( १३० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
शीतांग सन्निपातमें मनुष्यका शरीर अत्यंत शीतल होता है,
तथा वमन, अतिसार, कम्प, क्षुधाका नाश, अंगमर्दन, शरीरकी
पीड़ा, हिचकी, श्वास, श्रम, बेचैनी और संपूर्ण शरीरमें शिथिलता
होती है ॥ १०४ ॥
आनन्द भैरव ।
हिंगुलञ्च विषं व्योषं मरिचं टंकणं कणा ।
जातीकोषसमं चूर्णं जम्बीरद्रवमर्दितम् ॥ १०५ ॥
रक्तिमानां वटीं कुर्यात्खादेदार्द्रकसंयुताम् ।
वटीद्वयं त्रयं वापि सन्निपाते सुदारुणे ॥ १०६ ॥
ज्वरमष्टविधं हन्ति तथाऽतीसारनाशनः ।
जीर्णज्वरहरश्चैव तथा सर्वाङ्गभेदकः ॥ १०७॥
सिंगरफ, विष, त्रिकुटा, कालीमिरच, सुहागा, पीपल और जाय-
फल यह सब औषधि समान भाग लेकर जम्भीरीनींबूके रसमें खरल
करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंमेंसे दो गोली
अथवा तीन गोली लेकर अदरखके साथ घोरतर सन्निपातज्वरमें
देवे । यह औषधि आठ प्रकारके ज्वर, अतिसार, जीर्णज्वर, शरीर-
भेद और आमवातादि रोगोंको नष्ट करती है । इसको आनन्दभैरव
कहते हैं ॥ १०५-१०७ ॥
आनंद भैरवी ।
विषं त्रिकटुकं गन्धं टंकणं मृतशुल्वकम् ।
धूस्तूरस्य च बीजानि हिंगुलं नवमं स्मृतम् ॥१०८॥
एतानि समभागानि दिनैकं विजयाद्रवैः ।
मर्दयेच्चणकाभां तु वटीञ्चानन्दभैरवीम् ॥ १०९ ॥