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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 152

( १२६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
द्रवैश्चोत्तरवारुण्याश्चणमात्रा वटी कृता ।
सन्निपातं निहन्त्याशु नस्यमात्रेण दारुणम् ।
एषा कुलवधूनाम जले घृष्ट्वा प्रयोजयेत् ॥ ८८ ॥
अब सन्निपातज्वरकी चिकित्सा कहते हैं-शुद्ध पारा, तांबेकी
भस्म, सीसेकी भस्म, शुद्ध मैनशिल और शुद्ध तूतिया यह सब
औषधि समान भाग लेकर इन्द्रायनकी जड़के रसमें एक दिन खरल
करके चनेकी बराबर गोली बना लेवे । एक गोलीको जलमें घिसकर
नास देवे । इससे घोरतर सन्निपातज्वर नष्ट होता है ॥ ८७ ॥ ८८ ॥
जयमंगल रस ।
भस्मसूताभ्रकं तारं मुण्डतीक्ष्णालमाक्षिकम् ।
वह्निटंकणकव्योषं समं संमर्दयेद्दिनम् ॥ ८९ ॥
पाठानिर्गुण्डिकायष्टीबिल्वमूलकषायकैः ।
ततो मूषागतं रुद्ध्वा विपचेद्भूधरे पुटे ॥ ९० ॥
माषैकं दशमूलस्य कषायेण प्रयोजयेत् ।
अञ्जनेनाथवा नस्यात्सन्निपातं जयेद् ध्रुवम् ॥ ९१ ॥
पारद भस्म या रससिन्दूर, अभ्रककी भस्म, चांदीकी भस्म, मुण्ड-
लोह भस्म, तीक्ष्णलोह भस्म, हरिताल भस्म, सोनामाखी भस्म, चित्र-
ककी जड़, सुहागा और त्रिकुटा यह सब औषधि समान भाग लेकर
पाठ, सम्हालू, मुलैठी और बेलकी जड़के क्वाथमें एक दिन खरल
करके सुखा लेवे । फिर मूषामें बंद करके भूधर यन्त्रमें पुटपाककी
विधिसे पकावे । इसमेंसे एक मासे परिमाण औषधि लेकर दशमूलके
क्वाथसे सेवन करे । अथवा अंजन अथवा नस्यमें प्रयोग करनेसे
सन्निपातज्वर नष्ट होता है ॥ ८९-९१ ॥
नस्य भैरव ।
मृतसूतार्कतीक्ष्णाग्निं टंकणं खर्परं समम् ।