सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 146

( १२० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
सतक्रं वृन्ताकाढ्यं पथ्यमेव प्रदिष्टम् । अङ्गे रोगं
हन्ति सामं प्रभावात्पित्ताधिक्ये मूर्ध्नि वारिप्रयोगः ६०
पारा, गंधक, सुहागा और कालीमिरच यह प्रत्येक औषधि एक एक
भाग लेवे । और विष ( किसीके मतसे मिश्री ) चार भाग लेवे । इन
सबको एकत्र करके रोहू मछलीके पित्तमें अच्छे प्रकारसे खरल करके
तीन दिन वारंवार भावना देवे । अधिक संताप उत्पन्न हो तो अदरखके
रसके साथ इस औषधिको तीन रत्ती प्रमाण तीन दिन सेवन करे ।
रोगीको तक्रके साथ ठंडा भात भोजन करावे तथा बैंगनका शाक
पथ्य देवे । पित्तकी विशेष प्रबलता हो तो रोगीके मस्तक पर जलकी
धारा देवे । ( अथवा बर्फकी थैली मस्तक पर लगावे ) इस औषधिका
सेवन करनेसे साम और निराम ज्वर नष्ट होता है । इसको उदकमञ्जरी
रस कहते हैं ॥ ५९ ॥ ६० ॥
चन्द्रशेखर रस ।
अत्र·शर्करास्थाने मनःशिलायां चन्द्रशेखरो भवति ६१
इस उदकमञ्जरी रसमें विष ( किसीके मतसे मिश्री ) के स्थानमें शुद्ध
मनसिल मिलानेसे चन्द्रशेखर रस हो जाता है । यह रस अनुपान
विशेषसे पूर्वोक्त समस्त गुणोंको करता है ॥ ६१ ॥
पञ्चवक्त्र रस ।
रसो गन्धष्टंकणः सोषणोऽयं फणी पिप्पलीत्येष
धूस्तूरपिष्टः । जयेत्सन्निपात द्विगुञ्जानुपानं भवे-
दर्कमूलाम्बुसव्योषचूर्णम् ॥ ६२ ॥
पारा, गंधक, सुहागा, कालीमिरच, शीसाभस्म और पीपल यह
सब औषधियें समान भाग लेकर धतूरेके रसमें अच्छी प्रकारके खरल
करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको आककी जड़के
रसके साथ और त्रिकुटेके चूर्णके साथ सेवन करनेसे सन्निपातज्वर
नष्ट होता है । इसको पञ्चवक्त्र रस कहते हैं ॥ ६२ ॥