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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

चतुर्थस्तरङ्गः ४५
अधःपातनयन्त्रम्
ऊर्ध्वपात्रान्तरे सूतं लिप्त्वाधः पात्रके जलम् ।
निक्षिप्य भूमौ गर्तञ्च विधाय विन्यसेद् दृढम् ॥ ११ ॥
प्रदीप्तैश्छगणैस्तत्र वह्निं प्रज्वालयेद् भृशम् ।
रसज्ञैः कीर्तितमिदमधः पातनयन्त्रकम् ॥ १२ ॥
ऊर्ध्वपात्रान्तरे सूतं लिप्त्वेति तत्तदौषधमर्दितस्य पारदस्य ऊर्ध्वपात्रोदरे
लेपं विधायेत्यर्थः । अधःपात्रके जलं क्षिप्त्वा गर्ते जलपूरितमधःपात्रमेव सन्धि-
बन्धः पूरणीयः । अथवाधोमुखीनतया स्थापितस्योर्ध्वभाण्डस्य सूतलिप्तान्तर्ज-
ठरभागं बाह्यतो विहायान्यत्सर्वं यन्त्रं गर्ते दृढं स्थापनीयम् ॥ ११-१२॥
भा.टी.—अधःपातन यन्त्र के लिए भी उक्त प्रकार से दो हाँडी लें,
परन्तु दूसरी हाँडी में जलाधार आदि कोई न बनावें । ऊपर की हाँडी के
भीतर औषधियों के साथ मर्दित पारद का लेप कर दें और नीचे की हाँडी
में आधे भाग तक या कण्ठ तक जल ( शीतल ) भर दें । अब जलवाली-
हाँडी के मुख पर पारदवाली हाँडी को अधोमुख टिकाकर दोनों की मुख
सन्धि को कपड़मिट्टी से अच्छी तरह लेप करके सुखा लें । अब जमीन में
इतना लम्बा चौड़ा गढ़ा बनायें जिसमें कि निचली जलवाली हाँडी मुख
अधःपातन यन्त्र