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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 777

[९२] रसतरङ्गिणी
हैं। पूर्वोक्त सूचिकाभरणवाले रोगों अथवा अवस्थाओं में यह रस गुणकारक
माना जाता है ॥५६३-५६५॥
विषूचीध्वंसनरसः
कृष्णसर्पविषं शुद्धं विषं पारदगन्धकम् ।
सौभाग्यं नागरं ताप्यं मृतं माषमितं पृथक् ॥५६६॥
विशोधितं च दरदं सर्वेषां समभागिकम् ।
समादाय ततः खल्वे मर्दयेन्निम्बुकाम्भसा ॥५६७॥
वटिकाः कारयेद्वैद्यः श्वेतसर्षपसंमिताः ।
रसोऽयं तु समाख्यातो विषूचीध्वंसनाह्वयः ॥५६८॥
विषूचीध्वंसनरसो विषूचीविनिषूदनः ।
शीतपादकरायग्रलक्षणेषु सुखावहः ॥५६६॥
सूचिकाभरणोद्दिष्टविधानेन भिषग्वरः ।
विषूचीध्वंसनरसं प्रयुञ्जीत प्रयत्नतः ॥५७०॥
विषूचीध्वंसनरसः—ताप्यं माक्षिकम्, दरदं हिंगुलम् । स्पष्टमन्यत् ॥
भा.टी—शुद्ध कृष्णसर्पविष, शुद्ध वत्सनाभ,, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक,
सुहागा, सोंठ का चूर्ण, स्वर्णमाक्षिकभस्म, प्रत्येक एक-एक मासा और शुद्ध
हिंगुल, इन सब के बराबर भाग लें । पहिले पारे गन्धक तथा हिंगुल को एकत्र
घोंटकर उसकी कज्जली बना लें । फिर इसमें अन्य द्रव्यों का चूर्ण मिलाकर
एक खरल में नींबू के रस के साथ खूब अच्छी तरह से मर्दन करें । जब गोली
बनाने योग्य हो जाय तो इसको सफेद सरसों के बराबर गोलियाँ बनाकर रख
लें । इसको विषूचीध्वंसन रस कहते हैं । यह विसूचिका (हैजा) रोग को नष्ट
करता है । यह रस विसूचिका की उस अवस्था में विशेष लाभदायक है जब
कि रोगी के हाथ पैर ठण्डे हो गये हों, मुख पीला पड़ गया हो और नाड़ी नहीं
मिलती हो । वैद्य को इस रस का प्रयोग सूचिकाभरणरस के समान ही करना
चाहिए । अर्थात् पथ्य तथा उपचार सब शीत करने चाहिए ॥५६६-५७०॥
मृतसञ्जीवनरसः
कृष्णसर्पविषं शुद्धं विषं ताप्यं च टङ्कणम् ।
दरदं रसगन्धं च तालं माषमितं पृथक् ॥५७१॥
छागमायूरवाराहमात्स्यपित्तेन भावयेत् ।
निर्मापयेत्तु वटिकाः क्षुद्रसर्षपसंमिताः ॥५७२॥