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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 764

समाख्यातं प्रलेपेन ह्युपदंशव्रणापहम् ॥४६२॥
करवीरदलद्रावो नेत्रयोर्विनियोजितः ।
अभिष्यन्दं जलस्रावं व्यपोहति विशेषतः ॥४६३॥
करवीरस्य बाह्यप्रयोगः—उपदंशव्रणहरः नेत्राभिष्यन्दनाशनश्च । अपि च-
करवीरमूलत्वक् १ तो०, करवीरपुष्पाणि १ तो०, आफूकम् ३ मा०, अश्वगन्धा
१ तो०, धत्तूरबीजानि १ तो०, जले पिष्ट्वा वटिकाः कारयेत् । सेयं करवीरादि-
वटी प्रलेपतो ध्वजभङ्गहरी ख्याता इति ॥४६२, ४६३॥
भा.टी.--कनेर की मूलछाल को जल के साथ पीसकर लेप तैयार कर
लें । इस लेप को उपदंशव्रणों पर लगाने से उनमें आराम आता है । कनेर के
पत्तों का स्वरस नेत्रों में डाला जाय तो नेत्राभिष्यन्द तथा नेत्रों से पानी निक-
लना बन्द हो जाता है ॥४६२, ४६३॥
करवीराद्यं तैलम्
करवीरशिफाक्वाथविपक्वं तिलतैलकम् ।
कल्कीकृतविडङ्गाग्नियोगतो गोजलान्वितम् ॥४६४॥
करवीराद्यतैलं तु समाख्यातं भिषग्वरैः ।
अभ्यङ्गाद्विनिहन्त्याशु त्वग्गतान् विविधान् गदान् ॥४६५॥
करवीराद्यं तैलम्—गोजलं गोमूत्रम् । तैलसाधनाय करवीरमूलक्वाथः ४
प्रस्थमितः, विडङ्गं चित्रकश्च उभयोर्मानं मिलित्वा १ कुडवम्, गोमूत्रं ४ प्रस्थ-
मितम्, तिलतैलं १ प्रस्थमितम् ॥४६४, ४६५॥
भा.टी.—कनेर की छाल का क्वाथ चार सेर, वायविडंग तथा चित्रकमू-
लत्वक् प्रत्येक दस-दस तोला और गोमूत्र चार सेर लें । पहले विडंग तथा
चित्रकछाल को जल से पीसकर इसका कल्क बना लें । अब इस कल्क को एक
बड़े पात्र में डालकर इसमें एक सेर तिलतैल और तिलतैल से चौगुना कनेर
की छाल का क्वाथ तथा गोमूत्र मिलाकर अग्नि पर तैल सिद्ध कर लें । इसको
करवीराद्य तैल कहते हैं । इस तैल को शरीर में मालिश करने से अनेक प्रकार
के त्वक् रोग नष्ट हो जाते हैं ॥४६४,४६५ ॥
अथ लांगलिकाया नामानि
लाङ्गली हलिनी सीरी विशल्या कलिहारिका ।
अग्निजिह्वा स्वर्णपुष्पा दीप्ता नक्तेन्दुपुष्पिका ॥४६६॥
विद्युज्ज्वाला वह्निशिखा लाङ्गली गर्भपातिनी ।
हली लांगलिनी चैव समाख्याता भिषग्वरैः ॥४६७॥