रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोलियां बना लें । इसको गुञ्जाजीवन रस कहते हैं । इस रस के प्रयोग से
शरीर में बल की वृद्धि होती है और कामोत्तेजना बढ़ जाती है ॥४६४-४६६॥
गुञ्जाभद्ररसः
गुञ्जाबीजं सुविमलं रसस्तोलकसंमितम् ।
जयन्ती निम्बबीजं च रसस्तोलकसंमितम् ॥ ४६७ ॥
तोलकत्रितयं सूतं गन्धं द्वादशतोलकम् ।
समादाय ततः खल्वे पेषयेदतियत्नतः ॥ ४६८ ॥
काकमाचीजयाधूर्तनिम्बूकद्रवयोगतः ।
वटिकाः कारयेद्यत्नाद् गुञ्जाद्वितयसंमिताः ॥ ४६९ ॥
रसोऽयं तु समाख्यातो गुञ्जाभद्रसमाह्वयः ।
ऊरुस्तम्भं महाघोरं विनिहन्ति विशेषतः ॥ ४७० ॥
गुञ्जाभद्ररसे-रसस्तोलकसमितमिति षट्तोलकप्रमितम् । धूर्तः धत्तूरः ॥४७०॥
भा.टी.-शुद्ध गुञ्जाबीजचूर्ण छः तोला, जयन्ती छः तोला, निम्बबीजमज्जा
छः तोला, शुद्ध पारद तीन तोला, शुद्ध गन्धक बारह तोला लेवें । पहिले पारद
और गन्धक की पृथक् कज्जली कर लें, फिर इसमें अन्य द्रव्यों का चूर्ण मिला-
कर इसको एक खरल में मकोय स्वरस, जयास्वरस तथा धतूरस्वरस और नींबू-
रस के साथ खूब अच्छी तरह मर्दन करें । जब गोली बाँधने योग्य हो जाय तो
इसकी दो-दो रत्ती की गोलियां बना लें । इसको गुञ्जाभद्र रस कहते हैं । यह रस
महाभयंकर ऊरुस्तम्भ रोग में विशेष लाभ करता है ॥ ४६७-४७० ॥
अथ भल्लातकस्य नामानि
भल्लातकस्तु भल्लातस्तपनोऽरुष्करोऽग्निकः ।
कृमिघ्नश्चैव वातारिः स एव परिकीर्तितः ॥४७१॥
भा.टी.—भल्लातक, भल्लात, तपन, अग्नि के नामवाला अर्थात् वह्नि,
अग्नि, दहन, वायुसखा, आदि नाम युक्त, वातारि, व्रणकृत्, कृमिघ्न, अरु-
ष्कर—ये सब नाम भिलावे के कहे जाते हैं ॥ ४७१ ॥
वक्तव्य—हिमालय के गरम प्रदेशों में भिलावे का एक सुन्दर १० से ४०
फुट ऊँचा वृक्ष होता है । इसके पत्र बड़े ६ से ३७ इञ्च लम्बे, ५ से १२ इञ्च
चौड़े समभाग में गोल होते हैं । इसके फूल हरे श्वेत अथवा हरे-पीले होते हैं ।
फल एक इञ्च लम्बा, पौन इञ्च चौड़ा, अण्डाकार, लाल, चिकना और इसके
ऊपर की त्वचा मोटी होती है । इस फल के अन्दर एक दाहक रस होता है जो