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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 744

चतुर्विंशस्तरङ्ग ७१६
भा.टी.—भंगा, भंगी, मातुलानी, मादिनी, मातिका, मातुली, विजया,
तन्द्राकारिणी तथा बहुवादिनी, ये सब नाम भांग के कहे जाते हैं ॥३६१॥
वक्तव्य—भांग का काश्मीर और पश्चिमी हिमालय में तथा सर्वत्र मैदानों
में होनेवाला एक ऊंचा सीधा वार्षिक क्षुप होता है। इसका तना ४ से ८ फुट
लम्बा, पत्ते सात अंगुलियोंवाले होते हैं। इनका प्रत्येक पद्म लम्बा, दन्तुर
और नोकीला होता है। फूल छोटे पत्तों के पद्म में लगते हैं जिन में छोटे-छोटे
फल लगते हैं। एक-एक फल में एक-एक बीज होता है। फूल तथा फलों की
मञ्जरी, बीज, पत्र या इन पर लगा हुआ Resin काम आता है। मादाक्षुप के
Resin से युक्त अपक्वपुष्पों को "गांजा" कहते हैं। अपक्वपुष्पों में मादकपदार्थ
अधिक रहता है और पक जाने पर कम हो जाता है। गांजे में Cannabis
Resin २०% होता है। क्षुप के तरुण पत्रों और फलों को "भांग" कहते हैं।
भांग में Resin १०% होता है। पत्तों और फलों पर स्वभावतः उत्पन्न हुए
Resin को इकट्ठा किया जाता है और इसे "चरस" कहते हैं। यह Resin
प्रायः ६००० फुट ८००० फुट की ऊंचाई पर होनेवाले क्षुपों पर अधिक आता
है। इस चरस में Cannabine Resin ४०% होता है। इसे तम्बाकू के साथ
मिलाकर कई साधु और गृहस्थ लोग पीते भी हैं।
भांग में एक Resin होता है जो इसका क्रियाशील तत्व है और Can-
nabis Resin कहाता है।
भांग की अधिक मात्रा खायी जाने पर रोगी का शरीर शिथिल हो जाता
है और वह बेहोश हालत में पड़ा रहता है। इसके लिए निम्बू का रस या
और कोई वानस्पतिक खटाई खिलानी चाहिए। तीव्रावस्था में कुचला, Stri
Chinine आदि उत्तेजक औषधियाँ देनी चाहिए।
भङ्गायाः परिचयः
भङ्गा तु क्षुपजातीया सर्वत्र सुलभा मता ।
अतः परिचयस्तस्या विस्तरान्न प्रदर्शितः ॥३६२॥
दलद्रवो दलं बीजं मातुलान्या विशेषतः ।
प्रयुज्यते भेषजेषु कामं रसचिकित्सकैः ॥३६३॥
भा.टी.—भांग एक क्षुप जाति का पौधा है, प्रायः सभी देश में पाया
जाता है, इसीलिए इसका विस्तार नहीं बताया गया है। इसकी पत्ती का रस,
पत्ती और बीज का व्यवहार प्रायः वैद्यसमुदाय करता है ॥३६२, ३६३॥