रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसके अतिरिक्त यह सिंहलद्वीप तथा अन्य द्वीपों में भी पाया जाता है । इसी
वृक्ष के बीजों को जयपाल नाम से कहा जाता है । यद्यपि जयपाल के बीज
बड़ी दन्तीबीजों की अपेक्षा छोटे होते हैं । परन्तु इसमें बड़ी दन्तीबीजों की
अपेक्षा दस्त लाने की शक्ति बहुत तेज होती है ॥३०७-३०६॥
वक्तव्य— जयपाल को इंगलिश में Corlan और लेटिन में Croton
Tiglium कहते हैं । यह एक छोटा सदा हरा प्रायः सर्वत्र पाया जानेवाला
वृक्ष है । इसके पत्र २ से ४ इञ्च लम्बे, आगे से नुकीले तथा कुछ-कुछ दन्तुर
होते हैं । फूलों के गुच्छे २ से ३ इञ्च लम्बे, शाखाओं के सिरों पर होते हैं ।
इसका फूल १ इञ्च व्यास का, बीज आधा से ३/४ इञ्च लम्बे अण्डाकार के
होते हैं ।
जयपाल के बीजों में हरा, पीला, दाहक, गन्धयुक्त ३० से लेकर ४०%
तैल होता है । इसे Croton oil कहते हैं । यह ईथर, मद्यसार, क्लोरोफार्म
तथा जैतून के तेल में घुलनशील होता है तथा तीव्र क्षोभक और रेचक
( दस्तावर ) होता है ।
जयपालस्य प्रथमः शोधनप्रकारः
जयपालस्य बीजानि नवानि तु समाहरेत् ।
बाह्यत्वचमपाकृत्य द्विधा खलु विभेदयेत् ॥३१०॥
हरिद्वर्णां नातिदीर्घां रसनां तु परित्यजेत् ।
पोट्टल्यामथ विन्यस्य दोलायन्त्रे विधानतः ॥३११॥
गव्यदुग्धे प्रयत्नेन यामैकं स्वेदयेत्ततः ।
एवं त्रिवारं सुस्विन्नो जयपालो विशुद्ध्यति ॥३१२॥
अस्य प्रथमे शोधनप्रकारे—त्रिवारं स्वेदनविधानं स्नेहाधिक्यनिवृत्तये ॥
भा.टी.— जमालगोटे के नूतन बीजों को लेकर उनके बाहरी छिलके
अलग करके बीच से निकलनेवाली मींगी को चाकू से बीच में फाड़ लें ।
फाड़ने पर मींगी के बीच में से एक छोटी सी हरे रंग की जीभ सी होगी उसे
अलग फेंक दें । अब इस जीभरहित जयपाल बीज मज्जा को एक कपड़े में बाँध
पोटली बनाकर दोलायन्त्र में गाय का दूध डालकर एक पहर तक पकायें ।
इस प्रकार तीन बार गोदुग्ध में दोलायन्त्र द्वारा स्वेदन करने से जयपाल
शुद्ध हो जाता है ॥३१०-३१२॥
द्वितीयः शोधनप्रकारः
त्वग्रसज्ञाविरहितं जयपालस्य बीजकम् ।
वस्वंशटङ्कणोपेतं पोट्टल्यां रोधयेद् दृढम् ॥३१३॥