रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 664, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशस्तरङ्गः ६३६
शोष ( बुढ़ापे में होनेवाला क्षय ) भयंकर राजयक्ष्मा मेढ्रेन्द्रियकी शिथिलता,
और नपुंसकता, कास, भयंकर श्वास, अर्श रोग, अग्निमान्द्य, ग्रहणी, पाण्डु-
रोग, कामलारोग, उरःक्षत ( फुप्फुस में क्षय होने के कारण मुख से खून
निकलना ) आदि रोग निश्चित ही शीघ्र नष्ट हो जाते हैं ॥ १७६-१८१ ॥
वक्तव्य—इस रसायन को दिन में एक या दो बार सेवन कराना चाहिए
और रोगों के विभिन्न प्रकार के अनुपान भी स्वयं ही निर्धारित करने चाहिए ।
उरःक्षत आदि रोगों में यदि पिप्पली और मरिच अनुकूल न आते हों तो
वासास्वरस, लाक्षास्वरस, पेटास्वरस आदि के साथ वंशलोचन, प्रवालपिष्टी
आदि मिलाकर सेवन कराना चाहिये ।
अथ सूर्यकान्तस्य नामानि
सूर्यकान्तः सूर्यमणिस्तथा सूर्योपलाह्वयः ।
दीप्तोपलो वह्निगर्भो तथैव ज्वलनोपलः ॥ १८२ ॥
भा.टी.—सूर्यकान्त, सूर्यमणि, सूर्योपल, दीप्तोपल, वह्निगर्भ तथा ज्वल-
नोपल, ये सब नाम सूर्यकान्तमणि अर्थात् आतशीशीशे के कहे जाते हैं ।१८२।
ग्राह्यसूर्यकान्तस्य लक्षणम्
विमलो निस्तुषः स्निग्धो घृष्टो व्यामसुनिर्मलः ।
मसृणो निर्व्रणश्चैव जात्यः सूर्योपलः स्मृतः ॥ १८३ ॥
अथ सूर्यकान्तपरिचयः—ग्राह्य सूर्यकान्तस्य लक्षणं विमलो निस्तुष इति ।
उक्तञ्चान्यत्र—"शुद्धः स्निग्धो निर्व्रणो निस्तुषोऽन्त्यो निर्घृष्टोऽत्यन्तनैर्मल्य-
मेति । यः सूर्याशुस्पर्शान्निस्त्यूतवह्निर्जात्यः सोऽयं कथ्यते सूर्यकान्तः " इति। १८३।
भा.टी.—उत्तम सूर्यकान्तमणि, स्वच्छ और तुष रहित अर्थात् भीतर से
श्वेत वर्ण की तुष जैसी रेखाओं से युक्त नहीं होना चाहिए । यह बाह्यस्पर्श में
स्निग्ध और घिसने पर भी स्वच्छ चमकवाली और व्रण ( गढे ) रहित होती
है ॥ १८३ ॥
सूर्यकान्तस्य परीक्षणम्
यस्तु सूर्याशुसंस्पृष्टः प्रसूते दहनप्रभाम् ।
स एक जात्यः कथितः सूर्यकान्तः परीक्षकैः ॥ १८४ ॥
भा.टी.—जो सूर्यकान्त सूर्यकिरणों के स्पर्श से अग्नि उत्पन्न करके उसके
आगे रखी हुई वस्तु को ( रुई तिनका आदि ) जला देता हो, उसे ही उत्तम
सूर्यकान्त समझना चाहिये ॥ १८४ ॥