रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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मरकतगुणाः बल्यविषघ्नत्वादयः । आहुश्च प्राज्ञाः - "ज्वरच्छर्दिविषश्वास-
संन्निपाताग्निमान्द्यनुत् । दुर्नामपाण्डुशोफघ्नं तार्क्ष्यमोजोविवर्धनम्" इति। १०६,११०
भा.टी.- मरकत मणि की भस्म, बलवर्धक, शरीरगत विष नाशक, अग्नि
(पाचकाग्नि) दीपक, ओज वर्धक, उत्पादक अंगों के लिए बल्य, पाण्डुरोग तथा
शोथरोग नाशक होती है । इसके सेवन से श्वास रोग, वमन तथा बवासीर रोग
में लाभ होता है । तीव्र सन्निपात ज्वर की अवस्था में जब हृदय दुर्बल हो गया
हो, ज्ञान शक्ति क्षीण हो गयी हो और रोगी मृत्यु-मुख में जाने लगा हो तो
मरकत मणि की भस्म रोगी को जीवन प्रदान करती है ॥ १०६, ११० ॥
अथ मरकतस्य मात्रा
आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जैकप्रमितं परम् ।
मृतं मरकतं युञ्ज्यात् बलकालाद्यपेक्षया ॥ १११ ॥
भा.टी.- रोग तथा रोगी का बल काल देश अवस्था आदि का विचार
करके चौथाई रत्ती से एक रत्ती तक की मात्रा में मरकतमणि भस्म का प्रयोग
किया जा सकता है ॥ १११ ॥
अथ वैदूर्यस्य नामानि
विदूररत्नं वैदूर्यं केतुरत्नं विद्रूरजम् ।
बिडालाख्यं विडालाक्षं वायजञ्च प्रकीर्तितम् ॥ ११२ ॥
भा.टी.-विदूररत्न, वैदूर्य, केतुरत्न, विद्रूरज, बिडालाख्य, बिडालाक्ष,
वायज ये सब नाम वैदूर्य ( लसुनिया Cats Eye ) के कहे जाते हैं ॥ ११२ ॥
जात्यवैदूर्यस्य स्वरूपम्
वैदूर्यं गुरु सुस्निग्धं बिडालेक्षणसप्रभम् ।
भ्रमच्छुभ्रोत्तरीयाढ्यं वैदूर्यं जात्यमुच्यते ॥ ११३ ॥
अथ वैदूर्यपरिचयः-गुरुसुस्निग्धमिति उत्कृष्टं वैदूर्यरूपम् । उक्तं हि-
"वैदूर्य श्यामशुभ्रामं समं स्वच्छं गुरु स्फुटम् । भ्रमच्छुभ्रोत्तरीयेण गर्भितं शुभ-
मीरितम्" इति ॥ ११३ ॥
भा.टी.- उत्तम वैदूर्यमणि गुरुभार, अत्यन्त चिकना स्पर्श, बिल्ली के
नेत्र के समान चमकीला होता है । इस पर शुभ्रवर्ण का एक घेरा या यज्ञोपवीत
जैसा चिह्न पड़ा हुआ होता है ॥ ११३ ॥
हेयवैदूर्यस्य स्वरूपम्
विच्छायं लघु रूक्षञ्च सत्रासं चिपिटं खरम् ।
कृष्णां तथा मृच्छिलाढ्यं वैदूर्यं हेयमीरितम् ॥ ११४ ॥