रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 644, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशस्तरङ्गः ६१६
सुमृतं पुष्पराजन्तु प्रयुञ्जीत भिषग्वरः ॥ ६५ ॥
भा.टी.-पुखराजभस्म की मात्रा चौथाई रत्ती से लेकर एक रत्ती तक पूर्ण
मात्रा में सेवन की जा सकती है ॥ ६५ ॥
अथ नीलस्य नामानि
नीलो नीलोपलो नीलं नीलरत्नं सुनीलकम् ।
महानीलञ्च नीलाश्मशनिरत्नञ्च कीर्तितम् ॥ ६६ ॥
अथ नीलस्य परिचयः—ग्राह्यनीलस्वरूपं सरलात्तरम् । वचनं हि—"एक
च्छायं गुरु स्निग्धं स्वच्छं पिण्डितविग्रहम् । मृदु मध्ये लसज्ज्योतिः सप्तधा नील-
मुत्तमम्” इति ॥ ६६ ॥
भा.टी.--नील, नीलोपल, नीलरत्न, सुनीलक, महानील, नीलाश्म तथा
शनिरत्न ये सब नाम नीलम के कहे जाते हैं ॥ ६६ ॥
जात्यनीलस्य लक्षणम्
स्वच्छं सच्छायममलं मसृणं तु महोज्ज्वलम् ।
स्निग्धं गुरु लसज्ज्योतिर्जात्यं नीलं मतं बुधैः ॥ ६७ ॥
भा.टी.—उत्तम नीलम मणि, स्वच्छ तथा सुन्दर कान्तियुक्त, कुछ-कुछ
पारदर्शक, चिकनी और पर्याप्त चमकीली, गुरुभार तथा ज्योतियुक्त नील वर्ण
की होती है ॥ ६७ ॥
हेयनीलस्य लक्षणम्
रक्ताद्धं विगतच्छायं रूक्षं लघु च कोमलम् ।
परिहेयं शौरिरत्नं मतं रत्नपरीक्षकैः ॥ ६८ ॥
भा.टी.—आधे भाग में रक्तवर्ण और आधे भाग में नीलवर्ण की अपार-
दर्शक, रूक्ष, लघुभार, कोमल (दबाव डालने पर मुड़नेवाली अथवा शीघ्र
टूटनेवाली) नीलम त्याज्य समझनी चाहिए ॥ ६८ ॥
अथ नीलस्य शोधनम्
नीलीस्वरससंयुक्तं दोलायन्त्रे विधानतः ।
यामैकं परिपक्तन्तु नीलं शुद्ध्यति निश्चितम् ॥ ६९ ॥
भा.टी.—नीलमणि को दोलायंत्र में नील का स्वरस डालकर उसमें एक
पहर तक स्वेदन करके शुद्ध कर लेना चाहिए ॥ ६९ ॥
अथ नीलस्य मारणम्
माणिक्यमारणोद्दिष्टविधिभ्यामतियत्नतः ।