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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 623

५६८ रसतरङ्गिणी
अथास्य रोग्योग्यः प्रयोगः—निशा हरिद्रा, जन्तुघ्नं विडङ्गम् , सोमवल्कः
श्वेतखदिरः । मालतीकलिकाः तदाख्यवल्लीमुकुलानि । खगः काशीसम् ।
विसर्पिताम् इतस्ततो विसृतिम् ॥ १२०-१२६ ॥
भा.टी.—गेरू को हरिद्रा, आम्रबीजमज्जा, वायविडंग, खदिरसार तथा
रसवत चूर्ण में मिलाकर जल से पीसकर लेप करने से योनिकण्डू नष्ट हो जाती
है । नेत्राभिष्यन्द की पीड़ा में गेरू को सैन्धा नमक, मुलैठी और हरिद्राचूर्ण में
मिलाकर सेवन कराना चाहिए । कर्णमूल शोथ को बैठाने के लिये गेरू को
सोंठ अमलतास खडियामिट्टी तथा कायफल चूर्ण में मिला काञ्जी से पीसकर
लेप किया जाता है । शीतपित्त रोग को शान्त करने के लिए दो रत्ती सोनागेरू
को शहद में मिलाकर चटाया जाता है । शुद्ध सोनागेरू में हल्दी चूर्ण मिला
जल से पीसकर लेप करने से निःसन्देह शीत पित्त रोग से आराम आता है ।
रक्तपित्त में गेरू को चन्दन ( लाल ) खश तथा धनिया क्वाथ के साथ अथवा
खाँड़ और इलायची बीज चूर्ण के साथ देने से लाभ होता है । नेत्र के नूतन
व्रण शुक्र ( फूला ) में गेरू में चमेली की कलियों का क्षार तथा चन्दनचूर्ण
मिलाकर आँखों में लगाने से फूला कट जाता है । केवल शुद्ध सोनागेरू अथवा
कासीसचूर्ण मिश्रित स्वर्णगैरिक को घी में मिलाकर लेप करने से वीसर्प-शोथ
का फैलना रुक जाता है । आग से जलने के कारण होनेवाले व्रण की पीड़ा
में सोनागेरू को नारियल के तेल में मिलाकर लेप किया जाता है । जीर्णज्वर
अथवा पित्तप्रकोपाधिक ज्वर में शुद्ध स्वर्णगैरिकचूर्ण में रससिन्दूर मिलाकर
उचित अनुपान के साथ सेवन कराया जाता है ॥ १२०-१२६ ॥
गैरिकाद्यमलहरः
सुवर्णगैरिकं शुद्धं तोलकैकमितं शुभम् ।
तन्मितां रजनीञ्चैव माषकं भालभूषणम् ॥ १३० ॥
सिक्थतैलं च विमलं कर्षत्रितयसंमितम् ।
सम्पेष्य खलु यत्नेन काचकुप्यां तु विन्यसेत् ॥ १३१ ॥
गैरिकाद्यो मलहरो नामतः परिकीर्तितः ।
कण्डूदाहप्रशमनो विविधव्रणरोपणः ॥ १३२ ॥
इति मिश्रलोहादिविज्ञानीयो नाम द्वाविंशस्तरङ्गः ।