रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 610, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशस्तरङ्गः ५८५
अथ भाजनात्तृतीयात् निदधीत तुर्यपात्रे ॥७५॥
सलिलं तु यावदच्छं न भवेत्तु तावदेवम् ।
विदधीत वैद्यवर्यः सततं कृतावधानः ॥७६॥
सलिलं भवेद्यदाच्छं मलमेत्यधःप्रदेशे ।
सलिलोर्ध्वभागसंस्थं गिरिजं हरेद्विशुद्धम् ॥७७॥
विधिना ह्यनेन शुद्धिं तदुपैति निर्विशेषात् ।
गिरिजं विशुद्धमेवं विनियोजयेद्विशङ्कः ॥७८॥
शिलाजतुशोधनप्रकारश्चरकाचार्योक्त एव व्यवहृतः सर्वसम्मतश्चेति स एव
सरलाक्षरैर्गीतिकया च निर्दिष्ट आचार्य्यैः । युगसंमितानीति चत्वारि । अशुद्धन्तु
दाहादिकारणमाहुः । स्मरन्ति हि—"अशुद्धं दाहमूर्च्छायभ्रमपित्तास्रशोषकृत् ।
शिलाजतु प्रकुरुते मान्द्यमग्नेश्च विड्ग्रहम्" इति । प्रक्षेपक्वाथस्य मानञ्च जलम-
ष्टगुणं शिलाजतुसमानञ्च क्वाथ्यद्रव्यमिति । यथाह स्म वाग्भटः—"तुल्यं गिरि-
जेन जले वसुगुणिते भावनौषधं क्वाथ्यम्।" इति । इत्थं शुद्धस्य गुणोत्कर्षाय
भावनान्तरयोगोऽपि स्मर्य्यते कैश्चित् । विस्तरस्तु शिवागुटिकानिर्माणादौ वृद्ध-
वाग्भटेऽनुसन्धेयः । भृङ्गरसत्रिफलागोदुग्धादिभिः शोधनन्तु गोत्रदोषशान्तये तत्र
तत्र गुणाधानार्थञ्च कार्यमेव "गोदुग्धत्रिफलाभृङ्गद्रवैः पिष्टं शिलाजतु ! दिनैकं
लौहजे पात्रे शुद्धिमायात्यसंशयम्" इति स्मरणात् ॥ ६६-७८ ॥
भा.टो—बहुत तेज गर्मी के दिनों ( वैशाख और जेठ के महीने ) में जब
आकाश में बादल बिलकुल न हों, तेज हवा न चलतां हो तो उन दिनों में
शिलाजीत का शोधन करना चाहिए । शिलाजीतशोधन करने के लिए चार
बड़े-बड़े लोहे के पात्र ( कड़ाही, परात आदि ) लेवें । अब एक पात्र में शिला-
जतुचूर्ण ( पत्थर का चूर्ण या शिलाजीत का पिंड ) डालकर उसमें शिलाजतु
से द्विगुण गरम जल और शिलाजतु से अर्धभाग त्रिफलाक्वाथ मिलाकर तीन
घण्टे तक धूप में रख दें । इसके बाद धूप में ही इसको अच्छी तरह मसल कर
कपड़े में छान लें । अब छाने हुए काले रंग के शिलाजतु जल को उक्त चार
पात्रों में से एक पात्र में भरकर तेज धूप में रख दें । तेज धूप के लगने से जल
के ऊपर कोमल स्वच्छ तथा अतिकृष्णवर्ण की मलाई-सी लग जायेगी । इस
मलाई के सदृश पदार्थ को धीरे-धीरे निकालकर दूसरे वहाँ पर रखे हुए पात्र के
गरम जल में डाल दें । जब इस दूसरे पात्रस्थ जल के ऊपर मलाई-सी जम
जाय तो इसको तीसरे पात्र के गरम जल में डाल दें । इसी तरह तीसरे पात्र की