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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 603

५७ रसतरङ्गिणी
उभयोः शोधनप्रकारः सुगम एव । अपिच अञ्जनात् पञ्चामांशं ताम्रचूर्णं
दत्वा भस्त्राध्मातं गालयेत् । शीते सति मुद्गरघातं कुट्टयेत् । तथा हि अञ्जन-
तस्ताम्रयोगसंपत्त्या नागो विश्लिष्य पृथग्भवति ॥ ४१ ॥
भा.टी.—उक्त दोनों ही अञ्जनों को पृथक्-पृथक् खरल में डालकर भांगरे
के स्वरस के साथ सात दिन मर्दनकर सुखा लेने से भी ये शुद्ध हो जाते हैं॥४१॥
तृतीयः शोधनप्रकारः
फलत्रिकनिशायुग्मभृङ्गराजरसे भृशम् ।
अञ्जनद्वितयं स्विन्नं यामाच्छुद्धिमवाप्नुयात् ॥ ४२ ॥
भा.टी.—उक्त दोनों अञ्जनों की वस्त्र में पृथक्-पृथक् पोटली बनाकर
इनको दोलायंत्र विधि से त्रिफला, हरिद्रा तथा भांगरे के स्वरस में छः घण्टे
स्वेदन करने से भी ये शुद्ध हो जाते हैं ॥ ४२ ॥
स्रोतोऽञ्जनस्य गुणाः
स्रोतोऽञ्जनं तु शिशिरं तुवरं लेखनं परम् ।
स्निग्धं स्वादु परं ग्राहि कफपित्तविषापहम् ॥ ४३ ॥
रक्तपित्तक्षयहरं नेत्रामयनिषूदनम् ।
हिक्काच्छर्दिप्रशमनं स्तन्यवृद्धिकरं परम् ॥ ४४ ॥
भा.टी.—स्रोतोञ्जन (नीला सुरमा) शिशिर (शीतगुणवीर्य), तुवर
(कषायरस), उत्तम लेखन (नेत्रगत मल को पतला करके निकालनेवाला),
स्निग्ध, स्वादु (मधुर), ग्राही तथा कफपित्त तथा विष-प्रभाव-नाशक होता
है । इसके सेवन से रक्तपित्त तथा क्षय रोग नष्ट होते हैं । नेत्र रोगों को नष्ट
करता है । स्रोतोञ्जन हिक्का, छर्दि (वमन) को शान्त करता है और स्त्री के
स्तनों में दूध की वृद्धि करता है ॥ ४३, ४४ ॥
सौवीराञ्जनस्य गुणाः
सौवीरमञ्जनं ग्राहि स्निग्धञ्च तुहिनोपमम् ।
रक्तपित्तप्रशमनं नेत्रामयहरं परम् ॥ ४५ ॥
विषहिक्कापहं कामं व्रणशोधनरोपणम् ।
परं रजोदोधकरं रक्तप्रदरनाशनम् ॥ ४६ ॥
भा.टी.—सौवीराञ्जन ग्राही, स्निग्ध और बर्फ के समान शीतगुण होता
है । इसके सेवन से रक्तपित्त शान्त हो जाता है, नेत्र रोग मिट जाते हैं । यह
बाह्याभ्यन्तर शरीरगत विष तथा हिक्का को नष्ट करता है और व्रणों को शुद्ध