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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 596

द्वाविंशस्तरङ्गः ५७१
द्वितीयः शोधनप्रकारः
तनुपत्रीकृतं तप्तं रजनीरजसा युते ।
क्षिप्तं निर्गुण्डिकातोये पित्तलं शुद्धिमाप्नुयात् ॥६॥ .
भा.टी.—पीतल के पतले-पतले पत्र बनाकर अग्नि में गरम करे, जब अच्छी
तरह लाल वर्ण के हो जायें तो उन्हें निर्गुण्डीस्वरस में हल्दी का चूर्ण डाल
उसमें बुझा दें । इस प्रकार सात बार करने से पित्तल शुद्ध हो जाता है ॥६॥
अथ पित्तलमारणस्य प्रथमः प्रकारः
सूक्ष्मपत्रीकृतं शोधितं पित्तलं तुल्यगन्धान्वितं खल्वयन्त्रे न्यसेत् ।
पेषयेद्भास्करक्षीरसंयोजितं शोषितञ्चातपे सम्पुटे विन्यसेत् ॥१०॥
लेपिते मृत्स्नया पङ्कपिण्डाभया त्वग्निवारं पुटेद्वारणाख्ये पुटे ।
मारितं पित्तलं त्वत्र रीत्यानया जायते सुन्दरं कज्जलाभं परम् ॥११॥
मारणप्रकारः सूक्ष्मेति । भास्करक्षीरं अर्कदुग्धम् । अग्निवारं त्रिवारम् ।
पङ्कपिण्डाभयेति घनपंकेनेति यावत् । वारणाख्ये गजपुटे ॥ १०, ११ ॥
भा.टी.—शुद्ध पीतल को रेती से रेत कर चूर्ण बना लें । इसको खरल
में डालकर उसमें पीतल समभाग शुद्ध गन्धक मिलाकर उसको आक के दूध
के साथ खूब अच्छी तरह मर्दन कर धूप में सुखा लें । अब इसे एक सम्पुट में
बन्द कर दें और इसको गाढ़े-गाढ़े मिट्टी के कीचड़ से लेप करके सुखा लें ।
सूखने के बाद इस सम्पुट को गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार गन्धक के साथ
तीन गजपुट देने से पीतल की काजल के सदृश काले रंग की उत्तम भस्म हो
जाती है ॥ १०, ११ ॥
द्वितीयो मारणप्रकारः
तनुपत्रीकृतं शोधितं पित्तलं पलपञ्चकम् ।
समहिङ्गुलतालाभ्यां मर्दितं कन्यकाम्भसा ॥१२॥
सम्पुटस्थं ततः कृत्वा वारणाख्ये पुटे पुटेत् ।
त्रिधैवं पुटितं यत्नात् पित्तलं याति पञ्चताम् ॥१३॥
कज्जलाभं भवेद्भस्म रमणीयतरं शुभम् ।
इत्थं मृतं पित्तलं तु भवेद्-भ्रान्त्यादिवर्जितम् ॥१४॥
भा.टी—शुद्ध पीतल का चूर्ण पाँच पल लेकर खरल में डालें और इसमें
पाँच पल शुद्ध हिंगुल और पाँच पल शुद्ध हरताल भी डाल दें । फिर इसको
घीकुंआर के रस से खूब मर्दन करके सुखा लें । इस सूखे हुए चूर्ण को एक