रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशस्तरङ्गः ५६६
द्वितीय मारणप्रकारः
स्नुहीपत्ररसैर्यत्ना मर्दितं पुटितं मुहुः ।
निरम्लीभावपर्यन्तं कासीसं भस्मतामियात् ॥ २५९ ॥
आ.टी.—शुद्ध कासीसचूर्णं को थोहर के पत्रों के स्वरस में घोटकर टिकिया
बनावें। टिकियाओं को धूप में सुखाकर सम्पुट में बन्द करके लघुपुट में फूँक
देवें । इस प्रकार तब तक थोहरपत्र स्वरस के साथ घोटकर लघुपुट देते रहें
जबतक कि भस्म में बिलकुल ही खट्टापन न रहे । इस विधि से भी कासीस
की भस्म हो जाती है ॥ २५९ ॥
कासीसभस्मनो गुणादिनिरूपणम्
गुणमात्राविनिर्देशो लौहवत्परिकीर्तितः ।
विशेषतः श्वित्रहरं भिषग्भिः समुदीरितम् ॥ २६० ॥
इति उपधात्वादिविज्ञानीयो नाम एकविंशस्तरङ्गः ।
भा.टी.—कासीसभस्म की मात्रा तथा गुण लोहभस्म के समान ही सम-
झने चाहिये, किन्तु कासीसभस्म विशेष रूप से श्वित्रकुष्ठहर होती है ॥ २६० ॥
यह उपधात्वादिविज्ञानीय नाम इक्कीसवाँ तरङ्ग समाप्त हुआ ।
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अथ मिश्रलोहादिविज्ञानीयो नाम द्वाविंशस्तरङ्गः
अथ पित्तलस्य नामानि
पित्तलं पीतलोहञ्च कपिलोहञ्च रीतिका ।
आरं तथारकूटञ्च तदेव परिकीर्तितम् ॥ १ ॥
तत्रादौ पित्तलनामानि—पित्तलमिति ॥ १ ॥
भा.टी.—पित्तल, पीतलोह, कपिलोह, रीतिका, आर, आरकूट, ये सब
नाम पीतल के कहे जाते हैं। यह दो धातुओं के मिश्रण से बनता है ॥ १ ॥
पित्तलस्य निर्माणप्रकारः
द्विभागिकं सूर्यलोहं विधिना परिशोधितम् ।
भागैकिकं च यशदं विमलं तु समाहरेत् ॥ २ ॥
निधाय गारमूषायां प्रधमेत् प्रखराग्निना ।
द्रवीभूतं ततो ज्ञात्वा ढालयेद्रसकोविदः ॥ ३ ॥
रीत्याऽनया विशेषेण पित्तलं खलु निर्मितम् ।
भस्मीकृत्य प्रयुञ्जीत रसेषु रसकर्मवित् ॥ ४ ॥