रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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रजोदोषं शुक्रदोषं रक्तपित्तं सुदारुणम् ।
क्लैब्यं कण्डूं कामलाञ्च क्षयं पित्तं त्वगाश्रितम् ॥२२३॥
कासं श्वासं महाघोरं प्रमेहं चाचिरोत्थितम् ।
विनाशयेद्विशेषेण न सन्देहोऽत्र कश्चन ॥२२४॥
मृतकान्तपाषाणगुणाः—कान्तपाषाणः शिशिरस्तथा मूर्च्छादिरोगनाशनश्च ।
न सन्देहोऽत्र कश्चन इति अनुभवप्रत्ययः ॥ २२१-२२४ ॥
भा.टी.—कान्तपाषाण की भस्म शीतगुण और शीतवीर्य होती है । इसके
सेवन से शरीर मोटा ( बृंहण ) होता है और उसमें बलवृद्धि तथा उत्पादक
अंगों में उत्तेजना ( वृष्य ) उत्पन्न होती है । यह त्वच्य तथा मूर्च्छा और मोह
को दूर करती है । यह ज्वरनाशक, विषनाशक तथा वार्द्धक्यनाशक होती है ।
इसके सेवन से शरीर में रक्त की वृद्धि होती है और हृदय की घबड़ाहट ( पल-
पिटेशन) दूर होती है । यह मासिकधर्म की खराबी, शुक्रदोष, भयंकर रक्तपित्त,
नपुंसकता, कण्डू, कामला और क्षय रोगों को नष्ट करती है । इसके सेवन से
त्वगाश्रित पित्त ( रक्त में पित्त का प्रकोप मिश्रण ), कास, श्वास तथा पुरातन
प्रमेह रोग विशेष रूप से निःसन्देह दूर होते हैं ॥ २२१-२२४ ॥
अस्य मात्रा
कान्तपाषाणकस्येह रक्तिकाद्वितयोन्मिता ।
पूर्णमात्रा मता विज्ञैर्गदापनयनक्षमा ॥२२५॥
कान्तपाषाणभस्म की पूर्णमात्रा दो रत्ती तक प्रयोग की जा सकती है॥२२५॥
कान्तपाषाणस्य प्रयोगः
कान्तपाषाणकः कामं लोहवद् गुणकारकः ।
आमयेषु च सर्वेषु प्रयोगश्चापि तादृशः ॥ २२६ ॥
भा.टी.—कान्तपाषाण की भस्म प्रायः लोह अथवा कान्तलोह के समान
गुणकारक होती है । अतः सब रोगों में लोहभस्म के समान ही प्रयोग करना
चाहिए ॥ २२६ ॥
अथ काशीसस्य नामानि
काशीशकञ्च कासीसं पुष्पकासीसकन्तथा ।
पांशुकं पांशुकासीसं खगाख्यञ्च प्रकीर्तितम् ॥ २२७ ॥
भा.टी.—काशीशक, कासीस, पुष्पकासीसक, पांशुक, पांशुकासीस और
खग ( पछी ) के नाम कसीस के कहे जाते हैं ॥ २२७ ॥