रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशस्तरङ्गः ५५५
खर्परस्य प्रथमो मारणप्रकारः
खर्परं खल्वगं लोहमुद्गरेण विघातयेत् ।
पतितं प्रस्तरांशञ्च यत्नतः परिवर्जयेत् ॥ १८५ ॥
प्रस्तरांशपरित्यक्तं खर्परं त्वथ खल्वगम् ।
निम्बूकस्वरसोपेतं पेषयेत्सप्तवासरम् ॥ १८६ ॥
विशोषितं तु पीताभं श्लक्ष्णचूर्णं प्रजायते ।
एवं नातिचिरादेव खर्परः परिशुध्यति ॥ १८७ ॥
खर्परशोधनं निम्बुनीरेण मर्दनम्—सप्तधा निम्बूनीरे निर्वापणाद्वा काञ्जिके
तक्रे वा निर्वापणात् । उक्तं हि-“खर्परः परिसन्तप्तः सप्तवारान् निमज्जितः । निम्बू-
नीरद्रवस्यान्तर्निर्मलत्वमवाप्नुयात् ॥” इति ॥ १८५–१८७ ॥
भा.टी.—खपरिया के टुकड़ों को लेकर उनको लोहे के खरल या इमाम-
दस्ते में डाल लोहे की मूसली से खूब अच्छी तरह कूटें । कूटने पर जो पत्थर
के टुकड़े पृथक् हो जाँय उन्हें अलग करके पत्थर रहित भाग को खरल में डालें
और उसमें नींबू का स्वरस मिलाकर घोटें । जब नींबू का रस सूख जाय तो
पुनः स्वरस डालकर घोटें । इस प्रकार सात बार समभाग नीबूरस डालकर
घोटने के बाद सुखा लें । इसका सूक्ष्मचूर्ण हो जायेगा । इस विधि से खर्पर
शीघ्र ही अच्छी तरह शुद्ध हो जाता है । नींबू के रस में घोटने के बाद उसमें
जल डालकर थोड़ी देर रखकर ऊपर का स्वच्छ जल निकालकर फेंक दें । इस
तरह उसमें खटाई का अंश नहीं रहता है ॥ १८५–१८७ ॥
द्वितीयः शोधनप्रकारः
खर्परः प्रखरे वह्नौ सप्तधा परितापितः ।
निषिक्तो निम्बुकद्रावे शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १८८ ॥
भा.टी.—खपरिया के खण्डों को तीव्र अग्नि में गरम करके नींबू के रस में
बुझा दें । इस प्रकार सात बार नींबू के रस में बुझा देने से खर्पर की शुद्धि
हो जाती है ॥ १८८ ॥
तृतीयः शोधनप्रकारः
खर्परः परिसन्तप्तस्तके वा गृहवारिणि ।
निषिक्तः सप्तवारं तु विमलत्वमवाप्नुयात ॥ १८६ ॥
भा.टी.—खर्पर को तीव्र अग्नि में तपाकर सात बार तक्र में अथवा काञ्जी
में बुझा देने से भी वह शुद्ध हो जाता है ॥ १८६ ॥