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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 573

५४८ रसतङ्गरिणी
सिन्दूरस्य गुणाः
सिन्दूरं क्षुद्रकुष्ठघ्नं त्वच्यं व्रणविशोधनम् ।
भग्नसन्धानजननं तथैव व्रणरोपणम् ॥१५१॥
पामाविचर्चिकासिध्मवीसर्पशमनं परम् ।
भूतघ्नञ्च विशेषेण रक्तदोषनिषूदनम् ॥१५२॥
भूतघ्नं जीवाणुजालसंहार कम् । रक्तदोषनिषूदनमिति बाह्यलेपादेव । १५१,१५२।
भा.टी. - सिन्दूर बाह्य प्रयोग से क्षुद्र कुष्ठ-( पामा, विचर्चिका, कुष्ठ
आदि ) नाशक, त्वचा के लिए लाभदायक, व्रणशोधक, टूटी हड्डी को जोड़ने-
वाला तथा व्रणों को भरनेवाला होता है । इसके लेपादि से पामा, विचर्चिका,
सिध्म तथा विसर्प रोग नष्ट होते हैं । यह जीवाणुनाशक और उत्तम रक्तदोष-
निवारक है ॥ १५१, १५२ ॥
सिन्दूरस्य आमयिकः प्रयोगः
आभ्यन्तरः प्रयोगोऽस्य सिन्दूरस्य न दृश्यते ।
अतो बाह्यप्रयोगाथं यत्किञ्चिदुपदिश्यते ॥१५३॥
सिन्दूरं घृतसंयुक्तं लेपाल्लोचनवर्त्मनि ।
नाशयत्यचिरादेव कण्डूमञ्जननामिकाम् ॥१५४॥
मध्वाज्यगुग्गुलुगुडयुतंसिन्दूरलेपितौ ।
कामं तु स्फुटितौ पादौ भवतस्तूत्पलप्रभौ ॥१५५॥
आभ्यन्तरः प्रयोगोऽस्य न दृश्यते सततमुपयुक्तं हीदं मनःशिलाचयो गकृत-
नागभस्मवदुपद्रवान् जनयति । अस्य तु बाह्य एव प्रयोगो दृष्टचर इति स एव
यत्किञ्चिदुपदिश्यते-सिन्दूरं घृतसंयुक्तमिति ॥ १५३-१५५ ॥
भा.टी. - सिन्दूर का अन्तःप्रयोग नहीं देखा जाता है, अतः बाह्य प्रयोग
के लिए यहाँ पर कुछ कहा जाता है । सिन्दूर में घी मिलाकर नेत्रपलकों पर
लेप करने से शीघ्र ही नेत्रपलकों की कण्डू और अञ्जननामिका ( अञ्जनहारी,
गुडेरी ) शान्त हो जाती है । फटे हुए पैरों पर सिन्दूर, शहद, घी, गूगल और
गुड़ में मिलाकर लेप करने से कुछ ही दिनों में पैर कमल के सदृश कोमल
और सुन्दर हो जाते हैं ॥ १५३-१५५ ॥
प्रथमः सिन्दूराद्यो मलहरः
विमलं सिक्थतैलन्तु कर्षत्रितयसंमितम् ।
तोलकार्द्धमितं टङ्कं सिन्दूरञ्चापि तन्मितम् ॥१५६॥