सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 562, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 562

एकविंशस्तरङ्गः ५३७
द्रावयित्वा वर्तिमेकां पञ्चतोलोन्मिते जले ।
ततः कूर्चिकया यत्नादुष्ट्रकेशप्रणीतया ॥६०॥
द्रवप्रसिक्तया वर्त्म विपर्यस्तं समञ्जयेत् ।
क्लिन्नवर्त्म रुजं घोरां पोथकीञ्च विनाशयेत् ॥६१॥
तुत्थोदया वर्तिः-पञ्चतोलोन्मितमिति । यत्नतः श्लक्ष्णां यथा स्यात्तथेति भावः,
विपर्यस्तं निर्भुग्नम् । पोथक्यः—“स्राविण्यः कंडुरा गुर्व्यो रक्तसर्षपसन्निभाः ।
रुजावत्यश्च पिडकाः पोथक्य इति कीर्तिताः ॥” क्लिन्नवर्त्म—“अरुजं बाह्यतः
शूनं वर्त्म यस्य नरस्य हि । प्रक्लिन्नवर्त्म तद्विद्यात् क्लिन्नमत्यर्थमन्ततः” इत्यु-
क्तलक्षणम् ॥८८-६१॥
भा.टी.-अच्छी तरह साफ किया तुत्थ पाँच तोला, साफ सोरा और फिट-
करी प्रत्येक पाँच तोला, कपूर आधा तोला लेकर सब को एकत्र खरल में जल
से अच्छी तरह मर्दन करके दो-दो रत्ती की वर्तियाँ बना लें । प्रयोग के समय
एकवर्ति (बत्ती) को पाँच तोला शुद्ध जल में घोलकर द्रव बना लें । अब
द्रव में रुई का फाहा या कोमल ब्रश को भिगोकर नेत्र के पलकों को उलट
कर धीरे-धीरे उन पर अञ्जन करें अर्थात् कूची को पलकों पर फेर दें । इस तरह
प्रतिदिन कुछ काल तक करने से क्लिन्नवर्त्म तथा पोथकी-रोग में शीघ्र आराम
आ जाता है ॥ ८८-६१ ॥
तुत्थकादिवर्तिः
तुत्थकुष्ठवरादार्त्रीदन्तीमूलत्रिवृत्तिलैः ।
सकणासैन्धवक्षौद्रैः पिष्ट्वा निम्बदलाम्भसा ॥६२॥
कृतास्त्वेषणिकाकारा वर्तिका व्रणशोधिकाः ।
योजयेद्युक्तितो नाडीव्रणादौ च भगन्दरे ॥६३॥
एषणिका नाडीव्रणगत्यन्वेषणसाधनी शलाका ॥ ६२, ६३ ॥
भा.टी.-तूतिया, कूठ, त्रिफला, दारुहल्दी, दन्तीमूल, निशोथ, तिल,
पिप्पली, सैन्धानमक तथा शहद, इन सब को समभाग में लेकर एकत्र खरल में
नीम के स्वरस से मर्दन करें । जब बत्ती बनाने योग्य हो जाय तो इनकी एष-
णिका आकार ( Pore ) वर्ति बना लें । यह वर्ति नाड़ीव्रण, भगन्दर आदि
में प्रवेश करके रखी जाय तो इससे व्रण शुद्ध हो जाते हैं ॥ ६२, ६३ ॥
शिखिग्रीवादिवर्तिः
माषकैकं शिखिग्रीवं मरिचं कर्षसंमितम् ।
तोलकप्रमितेनाथ गृहनीरेण पेषयेत् ॥६४॥