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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 533

५०८ रसतरङ्गिणीं
बुद्धिवर्धकं होती है । लोहभस्म के गुणों के विषय में कहाँ तक कहा जाय यह
अनेक प्रकार के रोगों को नष्ट करती है ॥ ८३ ॥
अपि च—
लौहं दीपनमुत्तमं क्षयहरं कुष्ठामयध्वंसकं
गुल्मप्लीहविधूननं क्रिमिहरं पाण्ड्वामयघ्नं परम् ।
मेदोमेहनिबर्हणं गदहरं दुर्नामरोगान्तकृत्
छर्दिश्वासहरं त्वलं बहुगिरा योगेन नानार्तिनुत् ॥ ८४ ॥
अपि च प्रकारभेदेन गुणसमुच्चयः—लौहं दीपनमिति । दुर्नामरोगः अर्शांसि
योगेनेति युक्त्या प्रयुक्तमित्यर्थः ॥ ८४ ॥
भा. टी.—लोहभस्म उत्तमदीपन क्षयरोग, गुल्म, प्लीहा, उदरकृमि रोग-
नाशक और उत्तम पांण्डुरोगनाशक है । इसके प्रयोग से मेदोविकार तथा प्रमेह
रोग दूर होते हैं । गरविष तथा बवासीर, छर्दि, श्वास रोगों को नष्ट करती है ।
लोहभस्म के विषय में बहुत क्या कहें विभिन्न द्रव्यों के योग से यह नाना प्रकार
के रोगों को नष्ट करती है ॥ ८४ ॥
अपि च—
विसर्पकरिकेशरी प्रबलशूलनिर्मूलनः
क्षयक्षयकरः परं चिरजशोथ ह्लोचनः ।
यकृद्गदविधूननो गुदमहागदेभाङ्कुशः
परं विजयतेतरां विधिहतस्तु लौहो ह्ययम् ॥ ८५ ॥
भा.टी.—लौहभस्म विसर्परूपी हाथी के लिये सिंह के समान घातक, भयं-
कर शूलनाशक, क्षयरोग को क्षीण करनेवाली, चिरकालीन सर्वांगीण शोथ
को मिटानेवाली है । इसके सेवन से यकृत् के रोग, गुदा के रोग (बवासीर)
दूर होते हैं ॥ ८५ ॥
अपि च—
श्वासं नाशयति क्रिमीन् कृशयति क्षैण्यं क्षिणोति द्रुतं
शोषं शोषयति श्रमं त्वपहरेच्छूलं समुन्मूलयेत् ।
कासं ह्रासयति क्षयं क्षपयति भ्रान्तिं निहन्त्यन्ततः
स्थौल्यं विह्वलयत्यलं दलयति श्लेष्मामयान् सर्वथा ॥ ८६ ॥
भा.टी.—उत्तम लोहभस्म श्वास रोग को मिटाती है और उदर कृमियों को
मारती है । शरीर में होनेवाली क्षीणता को मिटाती है । शोष रोग (यक्ष्मा)