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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 531

५०६ रसतरङ्गिणी
एतत्तु माक्षिकहतं कान्तलोहं भिषग्वरः ।
तत्तद्विशिष्टयोगेषु प्रयुञ्जीत विधानतः ॥ ७७ ॥
तत्तद्विशिष्टयोगेषु इति यत्र यत्राचार्यैर्लोहस्य माक्षिकहतस्य योग उक्तस्तत्र
तत्रेति ॥ ७२-७७ ॥
भा.टी.- पाँच पल शुद्ध कान्तलोह लेकर खरल में डालें और इसमें सवा
पल परिमाण स्वर्णमाक्षिकभस्म मिलाकर निम्बू के स्वरस से दृढ़ मर्दन करके
सुखाकर चूर्ण कर लें । अब इस चूर्ण को शरावसम्पुट में अच्छी तरह बन्द
करके गजपुट में फूँक देवें । जब सम्पुट स्वांगशीत हो जाय तो लोह को निकाल
पीसकर कपड़े में छानलें । पुनः चतुर्थांश स्वर्णमाक्षिकभस्म मिला निम्बूस्वरस
से मर्दन कर गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार स्वर्णमाक्षिक भस्म के साथ तीन
गजपुट देवें । कपड़े से छानने से जो लौह के मोटे कण रह जायं उनको भी
समभाग स्वर्णमाक्षिकभस्म के साथ पुनः पुट देकर भस्म कर लें । तीन पुट देने के
बाद लोहभस्म में पूर्वोक्त पित्तनाशकगण की औषधियों का यथासम्भव स्वरस,
कषाय से पृथक्-पृथक् पुट देवें अथवा केवल आमलों के स्वरस में घोटकर तब
तक पुट देवें जब तक लोह की उत्तम भस्म न बन जाय । इस प्रकार स्वर्ण-
माक्षिकभस्म-सहयोग से बनायी हुई लोहभस्म को तत्तद् विशेष योगों में विधा-
नानुसार प्रयोग करें ॥ ७२-७७ ॥
सप्तमो मारणप्रकारः
विशोधितं कान्तलोहं धात्रीस्वरसपेषितम् ।
पुटेद् गजपुटेनैव शतधा कृतचक्रिकम् ॥ ७८ ॥
शतधा पुटितं कान्तं यात्येवं मृतिमुत्तमाम् ।
रसायनं परमिदं तथायुष्करमुत्तमम् ॥ ७६ ॥
भा.टी. - उत्तम कान्तलोह को खरल में डाल आँवलों के स्वरस के साथ
अच्छी तरह मर्दन करके टिकियाँ बनाकर सुखा लें । अब इनको सम्पुट में
अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार आँवलों के स्वरस में
घोटकर सौ बार गजपुट देने से कान्तलौह की उत्तम भस्म हो जाती है । इस
प्रकार बनायी हुई कान्तलौहभस्म रसायनगुणसम्पन्न और उत्तम आयुवर्धक
होती है ॥ ७८, ७६ ॥
अथ लौहनिरुत्थीकरणम्
मृतं लौहं गव्यमाज्यं तथा शुद्धञ्च गन्धकम् ।