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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

६ रसतरङ्गिणी
जहाँ पर औषधि-निर्माण में कोई विघ्न न हो सके, ऐसी एक रसशाला
(Pharmacy) बनानी चाहिये यह शाला विस्तृत और वायु के आने जाने
के लिये सुंदर खिड़की तथा रोशनदानों से युक्त होनी चाहिए । इसमें सब
औषधियाँ वर्ग-क्रम से रखी हुई और दीवारों पर रस-आचार्यों के चित्र टँगे
होने चाहिये । इसमें औषधिसिद्धि के लिये काम में आनेवाले सब साधन
पर्याप्त रूप में होने चाहिये ॥१३-१४॥
रसशालायां कर्मविभागः
शङ्करं पूर्वदिग्भागे स्थापयेद्भिषजाग्रणीः ।
आग्नेये वह्निकार्याणि याम्ये प्रस्तरकृत्यकम् ॥१५॥
शस्त्रकृत्यन्तु नैर्ऋत्ये क्षालनादीनि वारुणे ।
वायव्ये शोषणं शस्तमुत्तरे यन्त्ररक्षणम् ॥१६॥
निदध्यादीशकोणे तु रससाधनमूलकम् ।
मुख्योपकरणं तत्तन्नित्यकृत्यं समागतम् ॥१७॥
अत्र च कर्मसौकर्यार्थं दिग्भेदेन रसशालायां कर्मविभागमाह-शङ्करं पूर्व
दिग्भाग इति-शङ्करो रससाधकेष्टतमः, शङ्करप्रिय इत्याचार्यगुणेषूक्ते । वह्निका-
र्याणि भ्राष्ट्रीप्रभृतीनि, प्रस्तरकृत्यं खल्वपेषणादिकम् । याम्ये=दक्षिणस्याम् ,
वारुणे=पश्चिमायाम् ॥ अन्यत् सुगमम् ॥ १५-१७ ।
भा.टी.-पुरानी प्रथा के अनुसार पूर्वोक्त रसशाला में पूर्व दिशा में
शंकर की स्थापना करनी चाहिये और आग्नेय कोण में आग की भट्टी चूल्हा
आदि बनाने चाहिये । दक्षिण दिशा में सिल खरल में पीसने रगड़ने का कार्य
करने चाहिये । नैर्ऋत्य कोण में शस्त्र आदि से काटने आदि के कार्य करने
चाहिये । पश्चिम दिशा में जल से धोने के कार्य करने चाहिये । वायव्यकोण
में औषधि आदि को सुखाने के कार्य करने चाहिये । उत्तर दिशा में भिन्न-
भिन्न प्रकार के यन्त्रों को बनाकर रखना चाहिये और ईशान कोण में पारद
के शोधन-मारण में प्रतिदिन काम आनेवाले मुख्य-मुख्य उपकरणों को
रखना चाहिये । जिससे काम करनेवालों को सुविधा हो और समय नष्ट न
हो ॥ १५-१७ ॥
रसशालायां उपकरणद्रव्याणि
द्रोणीरूपा वर्तुलाश्च खल्वाः पाषाणनिर्मिताः ।
आयसाश्चापि संग्राह्यास्तद्योग्याश्चैव मर्दकाः ॥१८॥