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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 479

अष्टादशस्तरङ्गः ४५३
सितसारिवास्टतेन ह्यशितं सुवर्णवंगम् ।
व्रणमेहमुग्रवेगं खलु नाशयेन्निकामम् ॥ ६० ॥
ससुरप्रियोत्थचूर्णं ह्यशितं सुवर्णवंगम् ।
विनिवारयेद्विशेषात् द्रुतमेव रात्रिमेहम् ॥ ६१ ॥
लघुशाल्मलीशिफाया रजसा समन्वितन्तु ।
ह्यशितं सुवर्णवंगं बलवीर्यदं प्रदिष्टम् ॥ ६२ ॥
अपि च—
प्रतनुमधुविमिश्रं मासमेकं सपथ्यं
मृतयशदसमेतं शीलितं स्वर्णवंगम् ।
अपनयति विशेषाच्छुक्रतारल्यमारा-
ज्जनयति बलवृद्धिं भूयसीं भावुकानाम् ॥ ६३ ॥
समभागिकसिन्दूररससम्मिश्रितं तथा ।
सुवर्णवंगं मधुना वासरे तु द्विवारकम् ॥ ६४ ॥
सततं मासमात्रेण शीलितं पथ्यभोजिभिः ।
अवश्यं नाशयत्याशु शुक्रदौर्बल्यमुल्बणम् ॥ ६५ ॥
बहुला स्थूलैला, सुविमं शोभनचाकचक्यम्, सपथ्यं पथ्यरक्षायुक्तं यथा स्या-
त्तथा । माधवोचितं कङ्कोलम्, शीतलचीनी इति हिन्दीभाषायाम् । “कङ्कोलंकं
कृतफलं कोलकं कटुकं फलम् । चूर्णं कन्दफलं द्वीपं मारीचं माधवोचितम्।” इति
धन्वन्तरीयनिघण्टुः । सुरप्रियं कङ्कोलम् । सपथ्यं पथ्यभोजनयुक्तम् । आरात्
सत्वरमेवेत्यर्थः ॥ ८४-६५ ॥
भा.टी—स्वर्णवङ्ग को वङ्गभस्म के अनुपानों के साथ भिन्न-भिन्न रोगों में
सेवन करने से वङ्गभस्म के समान ही गुण देखे जाते हैं ।
उत्तम स्वर्णवंग को, जटामांसीचूर्णं और यशद ( जस्ता ) भस्म के साथ
मिलाकर अशोकक्वाथ अथवा खरेंटीकषायानुपान से सात दिन तक पथ्यपूर्वक
सेवन करने से श्वेतप्रदररोग का कष्ट निश्चित दूर हो जाता है । यदि इसी वंग
योग को नियमपूर्वक पथ्य के साथ एक मास तक निरन्तर सेवन किया जाय
तो बहुत दिनों का पुराना शुक्रमेह रोग नष्ट हो जाता है । व्रणमेह (सुजाक) को
दूर करने के लिये दो रत्ती उत्तम स्वर्णवंग को समभाग शीतलचीनीचूर्णं में मिला-
कर शीतल जल अथवा बलास्वरस अनुपान से सेवन किया जाता है । स्वर्णवंग
को दो रत्ती मात्रा में लेकर उसमें कच्ची हल्दी का स्वरस और शहद मिलाकर सेवन