रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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भा.टी.—मृदु स्वच्छ चांदी की तरह शीघ्र गलनेवाला शब्द रहित खुरक
श्रेष्ठ होता है ॥ ३ ॥
वक्तव्य—खुरक वंग को भाषा में रांगा कहते हैं । इसको पंसारी लोग
अपनी दुकानों में गुच्छे के रूप में टांगे रखते हैं और कलई करने के काम
आता है । निःशब्द का अर्थ प्राचीन वैद्य पिघलाने में शब्द नहीं करनेवाला
करते हैं । परन्तु वंग के अन्य धातु ताम्रादि का संयोग होने से उसमें तपानेपर
शब्द होता है ।
मिश्रकस्य लक्षणम्
द्रावेऽतिकठिनं रूक्षं त्वन्यधातुविमिश्रितम् ।
धूसरं कठिनञ्चैव मिश्रकं वङ्गमुच्यते ॥४॥
अन्यधातुमिश्रितमिति मिश्रकरूपयोग्यताहेतुः ॥ ४ ॥
भा.टी.—कठिनता से पिघलनेवाला, बाहर से खुश्क दिखाई देनेवाला,
धूसरवर्ण के कठोर वंग को मिश्रक कहते हैं । क्योंकि वंग में उक्त गुण अन्य
धातुमिश्रण से पाये जाते हैं । अतः इस प्रकार के वंग को मिश्रकवङ्ग कहा जाता
है ॥ ४ ॥
वङ्गस्य ग्राह्याग्राह्यस्वरूपनिरूपणम्
खुरकाख्यं शुक्ललोहं मारणाय प्रशस्यते ।
मिश्रकं हेयमाख्यातं रसतन्त्रविचक्षणैः ॥ ५ ॥
खुरकवङ्गं तयोरुपादेयमाहुः । तथा चोक्तम्—“खुरकन्तु गुणैः श्रेष्ठं मिश्रकं न-
रसे हितम्” इति ॥ ५ ॥
भा.टी.—उक्त विविध वंग में से खुरक संज्ञक वंग को औषधिप्रयोग में
काम लाने के लिये शोधन-मारणार्थ ग्रहण करना चाहिये । परन्तु रसशास्त्रज्ञ
मिश्रकवंग औषधि प्रयोगार्थ अग्राह्य समझते हैं ॥ ५ ॥
अथ वङ्गशोधनस्य प्रयोजनम्
विशुद्धिहीनं खलु शुक्रलोहं निषेवितं वाप्यमृतं तु नूनम् ।
निहन्ति सर्वां खलु कायकान्तिं कुष्ठं किलासञ्च परं विदध्यात् ॥६॥
गुल्मप्रमेहक्षयपाण्डुशोथश्लेष्मज्वरादींश्च भगन्दरञ्च ।
शुक्राश्मरीं रक्तविकारजातान् रोगाननेकान् जनयेच्च नूनम् ॥७॥
शोधनप्रयोजनं दोषजनकत्वादिति । किलासं श्वित्रम् । नूनं अवश्यम् ।
आहुश्च—“अशुद्धममृतं वङ्गं प्रमेहादिगदाप्रदम् । गुल्महृद्रोगशूलार्शःकासश्वास-
वमिप्रदम्” इति ॥ ६, ७ ॥