रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 462, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें४३४ रसतरङ्गिणी
वक्तव्य—भूनाग अथवा मयूरपिच्छों से प्राप्त होनेवाला सत्त्व ताम्र ही
होता है । परन्तु इस विधि से प्राप्त किये हुए ताम्र में अन्य धातु का मिश्रण न
होने से तथा नेपालजातीय ताम्र से भी इसमें विशेषता दिखाने के लिये भूनाग
और मयूरपिच्छों से ताम्र प्राप्त करने के लिये यह विधान लिखा है । इस सत्त्व
की भस्म करने के बाद अमृतीकरण भी ताम्र के समान ही करना चाहिये ।
अस्य गुणाः
भूनागसत्त्वं सुमृतं तुवरं कुष्ठनाशनम् ।
विषघ्नञ्च विशेषेण ताम्रवद् गुणकारकम् ॥१२१ ॥
भा.टी.—भूनागसत्त्व की भस्म कषायरस और कुष्ठरोगहर, विषनाशक होती
है । इसके अतिरिक्त इसमें ताम्रभस्म के पूर्वोक्त सभी गुण होते हैं ॥१२१॥
अस्य आमयिकः प्रयोगः
भूनागसत्त्वं मतिमान् ताम्रवद्विनियोजयेत् ।
ताम्रवच्चानुपनानि सहपानानि चादिशेत् ॥१२२॥
भूनागसत्त्वं विशेषतो विषनाशकम् । तुवरमिति रसे कषायम् । गुणतस्ताम्र-
समञ्चेति । अस्यानुपानादिक सर्वं ताम्रवदेवेति ॥ १२२ ॥
भा.टी.—भूनागसत्त्वभस्म का प्रयोग ताम्रभस्म के समान ही करना
चाहिये । और प्रयोग में अनुपान और सहपान द्रव्य भी ताम्रभस्म के समान ही
लेने चाहिए ।
मयूरपिच्छस्य सत्त्वपातनम्
भूनागसत्त्वमार्गेण सत्त्व मायूरपक्षजम् ।
निपातयेन्मारयेच्च रसतन्त्रावचक्षणः ॥१२३॥
भूनागसंत्त्ववच्चास्य गुणान् खलु समादिशेत् ।
आमयेषु च यत्नेन ताम्रवद्विनियोजयेत् ॥ १२४ ॥
इति ताम्रविज्ञानीयो नाम सप्तदशास्तरङ्गः
भा.टी.—उक्त भूनागसत्त्वपातन विधान से मोर के पंखों का भी सत्त्वपातन
करना चाहिये । और इस मयूरपिच्छसत्त्व की मारणविधि तथा गुण भी भूना-
गसत्त्व के समान ही समझने चाहिये । मयूरपक्षसत्त्व की भस्म को ताम्रभस्म के
समान ही विभिन्न रोगों में प्रयोग करना चाहिये ॥ १२३, १२४ ॥
यह ताम्रविज्ञानीय नाम सप्तदश तरङ्ग समाप्त हुआ
—:०:—